मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के आदेश अनुसार बीते कुछ दिनों से निजी स्कूलों पर प्रसाशन की ताबड़तोड़ कार्यवाही जारी है जिसमें संस्कारधानी जबलपुर कलेक्टर दीपक सक्सेना की कार्यशैली साधुवाद की पात्र है, वो इसलिए कि श्री सक्सेना जी ने जिस दबंगता से कानून का डंडा शिक्षा माफियाओं पर चलाया है वह काबिले तारीफ है, बड़े—बड़े धनसंपन्न सफेदपोशों के कृपापात्र आज सलाखों के पीछे पहुंच चुके है, मुद्दे की बात पर आते है कि वर्तमान कलेक्टर दीपक सक्सेना ने जिस साहस और कर्तव्यनिष्ठा के साथ निजी स्कूल संचालकों की गर्राहटी पर नकेल कसी है ये संस्कारधानी में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज की जायेगी, लेकिन विचारणीय ये है कि सक्सेना जी से पूर्व भी ना जाने कितने कलेक्टर आये और गए लेकिन किसी ने भी इन रसूखदार निजी स्कूल संचालकों की मनमानी ओर लूट पर लगाम कसने की हिम्मत नहीं की और बेचारा पीड़ित अभिभावक जिम्मेदार अधिकारियों की चौखट पर स्कूलों की लूट और जुल्म की फरियाद लगते रहे, पर सिर्फ अधिकारियों द्वारा आश्वाशन की ही लॉलीपॉप पकड़ा दी गई, अब प्रश्न ये उठता है कि आखिर ऐसे कौन से आकाओं की कृपा इन निजी स्कूल संचालकों पर बनी हुई है कि ये स्वयंभू बन खुद के नियम कानून लागू कर अपनी मनमानी और फीस, कॉपी किताबों के नाम पर मनचाही धनराशि वसूलने में परहेज नहीं कर रहे थे? सीधी सी बात है सियासत के गलियारों में स्थापित राजनीति के धुरंधरों की वर्चस्वता की परिणीति स्वरूप निजी स्कूल संचालकों सेवा से खुश होकर सत्ताधारियों द्वारा अपनी मनमानी करने की खुली छूट शायद इन शिक्षा माफियाओं को मिली हुई थी? खैर सर्वविदित है कि राजनेताओं के संरक्षण के बिना दो दूनी 200 का खेल हो पाना असंभव है? ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वर्तमान में जिस तरह से निजी स्कूल संचालकों, पुस्तक प्रकाशकों, विक्रेताओं पर ताबड़तोड़ कानूनी कार्यवाही हो रही है उससे हड़कम्प मचा हुआ है, तो वहीं अपने-अपने स्तर पर अपनी सियासती पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ये धनकुबेर इस जनहितकारी कार्यवाही को रुकवाने हर संभव प्रयास कर रहे है और कलेक्टर दीपक सक्सेना जी के तबादले के लिए अपने तिजोरियों के द्वार खोल दिये है, धनकुबेरों के इस भय का पूरा लाभ सियासतदारों की धनवृद्धि स्वरूप ही होगा? लेकिन जनमानस के दर्द को समझ कर राहत का अहसास कराने वाले जिला कलेक्टर श्री सक्सेना जी को उनकी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का क्या प्रतिफल मिलता है? और लूट का खुला खेल बंद होता है या बदस्तूर फिर शुरू होता है, मध्यप्रदेश का जनमानस बड़ी आतुरता और उम्मीद को संजोकर मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा उठाए जाने वाले आगामी निर्देशों पर टकटकी लगाये बैठा है?

