जबलपुर: दबिश तो दी पर दबाव में हाथ पांव फूल गए एडिशनल साहब?

जबलपुर: दबिश तो दी पर दबाव में हाथ पांव फूल गए एडिशनल साहब?

खाकी पर भारी खादी का रसूख…..

जबलपुर (नवनीत दुबे)I बीते दिन पुलिस विभाग के एडिशनल एसपी साहब पूरे दल-बल के साथ कुछ ऐसे रेस्टोरेंट पहुंचे जहाँ खुलेआम शराब परोसी जाती है, और रसूखदारों की बिगड़ैल औलादें यहाँ शराबखोरी कर जश्न मनाते है? विभाग के वरिष्ठ अधिकारी संजय अग्रवाल जो एडिशनल की कमान सम्हाले हुए है पूरे रौब ओर पुलिस पावर के साथ दबिश देने पहुंचे ओर विधिसम्मत कार्यवाही भी करने की कोशिश की, पर हाय री विडंबना साहब ओर उनके अधीनस्थों को ऐसा दबाव बना के दुबक कर रह गए, आखिर ऐसा तो होना ही था पुलिस विभाग के वरिष्ठ से लेकर आरक्षक तक कर्तव्य निष्ठा के चलते उड़ता तीर जो ले लिए थे, परिणामतः जब पता चला कि जिन रेस्टोरेंट पर दबिश दी है वो सब सियासत के आकाओं के प्रियजनों का है, बस तो फिर क्या साहब ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने उन लोगों पर कार्यवाही कर दी जो सिर्फ रुपया खर्च करके शराब सेवन करने गए थे। लेकिन दुर्भाग्य ही कहेंगे कि रेस्टोरेंट के संचालकों पर कार्यवाही करने का साहस खाकी में नही था, क्योकि वो सभी सत्ताधारी दल के दिग्गजों के कृपापात्र थे, साथ ही भाजपा के पदाधिकारी भी थे। भले छोटे-मोटे मामूली पद पर ही है? खेर मुद्दे की बात पर आते है कि पुलिस कप्तान के निर्देश पर हो रही इस तरह की अवैध गतिविधियों पर पुलिसिया दबिश खाकी के लाचार ओर असहाय होने की कहानी चीख-चीख कर बयां करती है, तभी तो आम जन ये बोलने से नही चूकते कि सारे नियम कानून आम आदमी के लिए है और रसूख दरों ओर सियासत से जुड़े छुटभैयों के सामने पुलिस दंडवत हो जाती है? वैसे आमजन की सोच कही न कही पुलिस विभाग की लाचारी पर सटीक बैठती है? हास्ययास्पद ही कहेंगे कि पुलिस कप्तान दिशा-निर्देश तो एक बन्द कमरे में अपने अधीनस्थों को दे देते है, पर सत्ताधारी दल के दिग्गजों की खरी-खोटी अधीनस्थों को सुननी पड़ती है जिससे उनका मनोबल गिरता है। साथ ही खाकी का स्वाभिमान खादी के पैरों तले रोद दिया जाता है? विदित हो ऐसा ही एक मामला थाना गोरखपुर में घटित हुआ था जहाँ वेवड़ो की पैरवी करने भाजपा नगर अध्यक्ष ठाकुर साहब अपने कार्यकर्ताओं की फ़ौज लेकर पहुंचे थे और सियासती रशुख का जमकर परिचय देते हुए खाकी को खरी-खोटी सुनाई थी। बेहद लज्जितपूर्ण बात है कि एक आम आदमी पर पुलिस अपना पूरा रौब ओर डंडे का पावर दिखाती है, लेकिन किसी सियासती रशुखदार के सामने दंडवत हो जाती है। आखिर ऐसा क्यो? कानून की परिधि में रसूखदार ओर आमजन को हैसियत अलग अलग है? खैर सर्विदित है कि प्रसाशनिक अधिकारी चाहे वह पुलिस विभाग से हो या अन्य विभाग से सत्ताधारियों की चरण वंदना के साथ ही उनके चमचों की गुलामी करने विवश रहता है? शब्द कटु है पर सोलह आने सत्य भी प्रतीत होते है। किंतु इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि खाकी की हठधर्मिता ओर रशुख के चलते बेगुनाहों को भी पुलिसिया रौब ओर डंडे की मार का शिकार बना लिया जाता है। ऐसे समय में यही सफेद पोश इन वर्दीधारियों को उनकी औकात दिखाते है? प्रश्न ये उठता है कि आखिर खाकी धारी, खादीधारी के सामने ही क्यो दुबकते है तो संभवतः ये कहना गलत नहीं होगा कि अवैध उगाही के चलते सारा खेल खेला जाता है?

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