जबलपुर: मुख्यमंत्री की घोषणा के 16 वर्ष बाद भी कोटवारों को सेवाभूमि पर नहीं मिला मालिकाना हक, अपील पर निर्णय तक बेदखल न करने के निर्देश

जबलपुर: मुख्यमंत्री की घोषणा के 16 वर्ष बाद भी कोटवारों को सेवाभूमि पर नहीं मिला मालिकाना हक, अपील पर निर्णय तक बेदखल न करने के निर्देश

जबलपुर, डेस्क। मप्र उच्च न्यायालय में एक याचिका की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया गया कि मुख्यमंत्री की घोषणा के 16 साल बाद भी कोटवारों को सेवाभूमि पर मालिकाना हक क्यों नहीं दिया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमथ व न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेकर याचिकर्ता कोटवार को समक्ष अधिकारी के समक्ष अपील दायर करने स्वतंत्र कर दिया। साथ ही व्यवस्था दे दी कि अपील के निर्णीत होने तक कोटवार का सेवाभूमि पर कब्जा बरकरार रहेगा, उसे सेवाभूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा। यही नहीं अपील की सुनवाई के दौरान पूर्व का कोटवार सेवाभूमि विरोधी आदेश भी निष्प्रभावी रहेगा।

मालिकाना हक की घोषणा
इस मामले की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता कटनी निवासी ग्राम कोटवार रामनरेश दाहायत की ओर से अधिवक्ता मोहनलाल शर्मा, शिवम शर्मा व अमित स्थापक ने पक्ष रखा। उन्होंने अवगत कराया कि 30 जून 2007 को राजधानी भोपाल में कोटवार महापंचायत आयोजित हुई थी। उसमें मुख्यमंत्री ने प्रदेश के समस्त कोटवारों की पात्रता परीक्षा के बाद सेवाभूमि पर मालिकाना हक दिए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद तीन मार्च 2010 व 14 अक्टूबर 2014 को मप्र शासन की ओर से दो परिपत्र जारी किए गए। इनके जरिये प्रदेश के समस्त कलेक्टर को निर्देश दिया गया कि मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप समस्त कोटवारों को पात्रता परीक्षण के उपरांत सेवाभूमि पर मालिकाना हक दिए जाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि कोटवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी कई वर्षों से सेवाभूमि पर कृषि कार्य के जरिये जीविकोपार्जन करते आ रहे हैं।

मनमान प्रस्ताव लाया गया
अधिवक्ता मोहनलाल शर्मा ने दलील दी कि 2017 में मनमाने तरीके से मुख्यमंत्री द्वारा 2007 में की गई घोषणा व अध्यादेश के विपरीत समस्त कोटवारों की सेवाभूमि नजूल भूमि घोषित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया। तत्कालीन मंत्री गोविंद सिंह ने इस प्रस्ताव को अनुचित पाकर निरस्त करते हुए साफ कर दिया कि कोटवारों को उनकी सेवाभूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद 28 फरवरी 2017 को सचिव मप्र शासन, राजस्व विभाग ने आदेश जारी किया कि समस्त शहरी-नगरीय क्षेत्र की सेवाभूमि को नजूल किया जाए। इस आदेश को 2019 में याचिका के जरिये मप्र उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। न्यायालय ने सुनवाई के बाद अंतरिम स्थगनादेश के साथ राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब-तलब कर लिया।

बेदखल न किए जाये
इस मामले में राज्य की ओर से प्रस्तुत जवाब को सभी विचाराधीन याचिकाओं के परिप्रेक्ष्य में मान्य करते हुए 16 फरवरी 2022 को सुनवाई पूरी कर ली गई। साथ ही 16 मार्च 2022 को याचिका निरस्त कर दी गई। जिसके खिलाफ अपील दायर की गई। जिस पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने एकलपीठ के पूर्व आदेश को सही ठहराते हुए कोटवारों को समक्ष अधिकारी के समक्ष अपील के लिए स्वतंत्र कर दिया। अपील पर सुनवाई की प्रक्रिया में 28 फरवरी 2017 के पूर्व आदेश को प्रभावशाील न रखने जाने की भी व्यवस्था दी। इस बीच कोटवारों को सेवाभूमि से बेदखल न किए जाने की राहत भी दे दी।

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