जबलपुर (नवनीत दुबे)। मानसून अभी अपने पूरे शबाब पर आया भी नहीं के स्मार्ट सिटी की कुरूपता नजर आने लगी है, साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्ररिनिधियो की करनी ओर कथनी की पोल खुलने लगी है, हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि संस्कारधानी में नेताओं के बड़बोलेपन का खामियाजा शहर के जनमानस को पीड़ादायी अनुभव कराता आ रहा है, विकास की बड़ी—बड़ी बातें हो रही है और जमींनी तह पर स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है, विडंबना ही कहेंगे कि जरा सी बारिश में जलप्लावन की स्थिति पूरे शहर में बनने लगी है और विकास जलप्लावन में उतरा कर भ्रष्ट व्यवस्था की दास्तां चीख—चीख कर बयां कर रहा है, हास्यदपद ही कहेंगे कि जनमानस द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि चाहे पार्षद हो, विधायक हो, सांसद हो या मंत्री सब के सब दोषरोपण की राजनीति कर रहे है लेकिन माननीय ये भूल रहे है कि लंबे समय से प्रदेश में भाजपा की सरकार रही है और नगर सत्ता में भी भाजपा ही काबिज है अब ऐसे में दोषरोपण की सियासत करके भाजपाई माननीय खुद की अस्मिता बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे है, बेहद लज्जापूर्ण पहलू है कि एक ओर तो स्मार्ट सिटी के नाम पर बड़ी— बड़ी सौगातों की बात हो रही है तो वहीं दूसरी ओर जो हालात दृष्टिगत हो रहे है वह जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली इच्छाशक्ति को प्रदर्शित कर कमीशन ओर खाई बाजी निजस्वार्थ को जनमानस के सामने प्रदर्शित कर रहा है, सोचनीय है कि नारकीय हालात से प्रतिदिन रूबरू होते संस्कारधानी वासी आखिर किस माननीय की बातों पर भरोसा करें और संस्कारधानी में निर्मित होते जलप्लावन के हालात, भीषण जलसंकट इत्यादि समस्याओं के व्यवस्थित निराकरण को साकार होता देख पाए, अंततः ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आम जनमानस द्वारा जनप्रतिनिधियों की चाटुकारिता का ही परिणाम है जो आज भीषण संकट और जनसमस्याओं के रूप में सालों से सामने आ रहा है और संभवतः ये समस्याये यथावत बनी ही रहेंगी और माननीय आस्वाशनो का लॉलीपॉप थमा कर जनता जनार्दन के विश्वास का मजाक बनाते रहेंगे?

