
डिंडौरी राठौर रामसहाय मर्दन। 27 साल पहले 1998 में जब डिंडौरी को मंडला से अलग कर एक नया जिला बनाया गया था, तो उम्मीद थी कि यह आदिवासी अंचल विकास की नई मिसाल बनेगा। लेकिन 27 साल की यात्रा में यह जिला अब भी बुनियादी विकास की सीढ़ियां चढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है। स्थिति यह है कि गांवों में सड़क नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं और घरों में पानी नहीं।
प्रशासनिक व्यवस्था अधूरी, विभाग केवल नाम के लिए…
डिंडौरी जिले में कई विभाग ऐसे हैं जहाँ वर्षों से पद रिक्त हैं। एक अधिकारी को कई विभागों का प्रभार दिया गया है। इससे प्रशासनिक जवाबदेही शून्य हो गई है। कई विभागों में या तो प्रभारी अधिकारी हैं या फिर अस्थायी कर्मचारी, जिससे न योजनाएं सही ढंग से क्रियान्वित हो रही हैं और न ही जनता को समय पर लाभ मिल रहा है। ग्राम पंचायतों की स्थिति और भी बदतर है – महीनों सचिव नहीं आते, जिससे मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं अधर में लटकी रहती हैं।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी, विकास का कोई सवाल नहीं….
सबसे बड़ी विफलता जिले के जनप्रतिनिधियों की रही है। चाहे सांसद हों या विधायक, आज तक किसी ने जिले की मूलभूत समस्याओं पर विधानसभा या संसद में सवाल तक नहीं उठाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि, “नेता चुनावों के समय वादों की झड़ी लगाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद पांच साल तक उनका कोई अता-पता नहीं रहता।”
जिला मुख्यालय सहित गांव की सड़कों की हालत बदतर..
जिले की इसी कई सड़कों की हालत इतनी खराब है कि बारिश के दिनों में कई गांव मुख्य सड़क से कट जाते हैं। डिंडौरी से जुड़ने वाली आंतरिक सड़कों की मरम्मत सालों से नहीं हुई है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा ना के बराबर है, जिससे बुजुर्गों, छात्रों और मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
शिक्षा का हाल बेहाल, स्कूल तो हैं, शिक्षक नहीं…
डिंडौरी जिले में प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक पूरे विद्यालय का भार संभाल रहे हैं। दूरस्थ गांवों में स्कूल भवन तो बने हैं, लेकिन न बिजली है, न टॉयलेट, और न ही शिक्षक। यही कारण है कि बालिकाओं की शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हो रही है, जिससे बाल विवाह की घटनाएं फिर से बढ़ रही हैं।
स्वास्थ्य सुविधाएं दम तोड़ रहीं, जान जोखिम में….
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, नर्सों और दवाइयों की भारी कमी है। प्रसव की व्यवस्था ना होने से ग्रामीण महिलाएं खेतों और घरों में प्रसव के लिए मजबूर हैं। टीकाकरण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएं बहुत सीमित हैं।गंभीर मरीजों को 100-150 किमी दूर जबलपुर या मंडला रेफर किया जाता है, जिससे समय पर इलाज न मिल पाने के कारण कई बार जान पर बन आती है।
पेयजल संकट विकराल, लोग कई किलोमीटर पैदल चलते हैं…
गर्मियों में जिले के कई गांवों में हैंडपंप और कुएं सूख जाते हैं। जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं का लाभ अब तक अधिकांश गांवों तक नहीं पहुंच सका है। महिलाएं और बच्चे कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं।
रोजगार नहीं, इसलिए हो रहा भारी पलायन…
स्थानीय रोजगार के साधनों की भारी कमी ने पलायन को मजबूरी बना दिया है। जिले के हजारों मजदूर हर साल छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं। इससे गांवों में सामाजिक ढांचा भी कमजोर हो गया है।
अब घोषणाओं से नहीं, ज़मीनी बदलाव चाहिए…
स्थानीय लोगों का कहना है कि अब केवल भाषणों और घोषणाओं से काम नहीं चलेगा।
उनकी मांगें साफ हैं:
रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्तियाँ हों
विभागों में स्थायी अधिकारी नियुक्त किए जाएं
योजनाओं की नियमित निगरानी और क्रियान्वयन सुनिश्चित हो
सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा पर प्राथमिकता से कार्य हो
समाप्ति नहीं, नई शुरुआत की ज़रूरत….
डिंडौरी की जनता अब जागरूक हो चुकी है। वे केवल वादे नहीं, ठोस कार्य देखना चाहते हैं। अब वक्त है कि शासन और प्रशासन ज़िम्मेदारी ले और डिंडौरी को वाकई आदिवासी विकास का मॉडल बनाए। क्योंकि अब जनता सवाल पूछ रही है – 26 साल बाद भी अगर कुछ नहीं बदला, तो जिम्मेदार कौन है?



