तनख्वाह से लेकर पेंशन तक, नेता हैं ‘वीआईपी’ क्लब में; जनता सिर्फ टैक्स देखने को
साईडलुक (सत्यजीत यादव)। देश की राजनीति में सेवा की भावना कहीं पीछे छूट गई है और इसकी जगह “सौभाग्यशाली जीवनशैली” ने ले ली है, जिसका पूरा खर्चा जेब काट टैक्स देने वाली मिडिल क्लास को वहन करना पड़ रहा है। हाल ही में जारी आंकड़ों ने इस विसंगति को तेजी से उजागर किया है, जहां एक ओर जनप्रतिनिधि ‘करोड़पति’ क्लब का हिस्सा हैं, वहीं दूसरी ओर उनके लिए सरकारी स्तर पर विलासिता के दरवाजे खोल दिए जाते हैं।
यह सवाल अब हर उस मिडिल क्लास परिवार के मन में उठ रहा है, जो हर महीने इनफ्लेशन से जूझता है लेकिन विधायकों के बिजली के बिल (जो राज्य सरकार सीधे चुकाती है) और सांसदों के फ्लाइट किराए की भरपाई अपने टैक्स से करता है।
मिडिल क्लास बनाम ‘करोड़पति’ नेता: खाई चौड़ी हुई
एक तरफ मिडिल क्लास पीछे हट गई है, वहीं राजनीतिक दलों में करोड़पतियों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ रही है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के अनुसार, लोकसभा के 93% सांसद अब करोड़पति हैं। इससे भी चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सियासी ओहदा पाने के बाद इनकी संपत्ति में आसमान छूती बढ़ोतरी होती है। आंकड़े बताते हैं कि एक साधारण शहरी परिवार की औसत संपत्ति तकरीबन 33,000 डॉलर (लगभग 27 लाख रुपये) है, जबकि एक सांसद की औसत संपत्ति 900,000 डॉलर (लगभग 7.5 करोड़ रुपये) है। यानी एक नेता एक औसत शहरी परिवार से 27 गुना ज्यादा अमीर है।
सरकारी खर्चे पर ‘फाइव स्टार’ सुविधाएं
सिर्फ अपनी निजी दौलत ही नहीं, बल्कि सरकारी खर्चे पर मिलने वाली सुविधाओं के मामले में भी नेता किसी राजा-महाराजा से कम नहीं हैं।
आवासीय विलासिता: पटना में विधायकों के लिए बनकर तैयार हुए नए आवासीय परिसर की बात करें तो यह किसी 5 सितारा होटल से कम नहीं है। 44.41 एकड़ में फैले इस परिसर में 3,693 वर्ग फुट के डुप्लेक्स फ्लैट हैं, जिनमें आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ “जीरो डिस्चार्ज” और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसी इको-फ्रेंडली सुविधाएं भी हैं, जिसका खर्चा जनता ही उठाती है।
फंड का फायदा: प्रत्येक विधायक के पास 5 करोड़ रुपये का सालाना स्थानीय क्षेत्र विकास कोष होता है। इसका उपयोग सोलर पैनल से लेकर सड़कों तक के निर्माण में किया जाता है । हालांकि, चिंता का विषय यह है कि आम आदमी तक यह राशि कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है, जबकि नेताओं के अपने घरों में बिजली से लेकर पानी तक की मुफ्त सुविधाओं पर कोई अंकुश नहीं है ।
वीआईपी कल्चर: जनता की टैक्स की कमाई पर सवारी
भारत में यह ‘वीआईपी कल्चर’ गहराई से जड़ें जमा चुका है। फ्लाइट में अलग बुकिंग काउंटर, सड़क पर सायरन (भले ही अब नियमों में बदलाव हुआ है) और पुलिस बल की सुरक्षा का विशेष इंतजाम। यही वो कारण है कि राजनीति को अब ‘सेवा’ के बजाय ‘पोर्टफोलियो’ (निवेश) का जरिया माना जाने लगा है। यह वही तंत्र है जहां पैसा चुनाव जिताता है और चुनाव जीतने के बाद यह पैसा कई गुना बढ़कर वापस लौटता है।
जनता की नजरों में सियासी तपस्या कहां गई ?
जिस देश के प्रधानमंत्री लाल किले से ‘साबका साथ’ की बात करते हैं, वहां यह दोहरा मापदंड (Double Standard) कड़वी सच्चाई बनकर उभरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नेता खुद “मिडिल क्लास” की तरह की समस्याओं (ट्रैफिक जाम, बिजली कटौती, पानी की किल्लत) का सामना नहीं करेंगे, तब तक उन नीतियों में बदलाव नहीं आएगा। मिडिल क्लास का मानना है कि त्याग और तपस्या सिर्फ उन्हीं के ‘नसीब’ में क्यों है, जबकि ‘सेवक’ बनने का दावा करने वाले दूसरे देशों में आम नागरिकों की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं।

