डीजी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने किया अतिथियों का स्वागत, 1985 बैच के आईएएस अनिंदो मजूमदार ने बताया कानून और नैतिकता में फर्क, बीआरओ सचिव डॉ. राजेंद्र कुमार ने समझाया एआई और स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट का भविष्य
साईडलुक, नई दिल्ली। कारपोरेट कार्य मंत्रालय के अधीनस्थ भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स ने अपने चर्चित वीकेंड विजडम कार्यक्रम के तहत प्रशासनिक अनुभव और तकनीकी दूरदर्शिता का अनूठा संगम पेश किया। संस्थान के महानिदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह के आमंत्रण पर दो वरिष्ठ नौकरशाह संसाधन व्यक्ति के तौर पर पहुंचे और पीजीआईपी एवं एलएलएम के छात्रों के साथ गहन संवाद किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में डीजी और सीईओ ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने पहले अतिथि 1985 बैच के आईएएस अधिकारी अनिंदो मजूमदार का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि लगभग चार दशकों के समृद्ध और विविध प्रशासनिक अनुभव वाले श्री मजूमदार ने सचिव केंद्रीय सतर्कता आयोग के तौर पर और वर्तमान में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण कोलकाता में सदस्य प्रशासनिक के पद पर रहते हुए सार्वजनिक जीवन में नैतिक आचरण को लेकर जो काम किया है, उसकी सर्वत्र सराहना होती है। उन्होंने अफगानिस्तान जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में नेशनल इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग प्रोजेक्ट के तहत विकास सलाहकार के रूप में सॉफ्ट पावर के प्रभावी इस्तेमाल का भी जिक्र किया, जिसने विकास प्रक्रिया में जनभागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया।
छात्रों के साथ एथिक्स और कॉर्पोरेट गवर्नेंस विषय पर बातचीत करते हुए अनिंदो मजूमदार ने कानून और नैतिकता के बीच के बारीक अंतर को बड़े ही सरल उदाहरण से समझाया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद शासन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस शासन को पूरी तरह कानून का समर्थन प्राप्त था, फिर भी वह पूरी तरह अनैतिक था, इसलिए कानूनी होना ही नैतिक होने की गारंटी नहीं है। भारत की सतर्कता और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में दशकों तक काम करने के अनुभव के आधार पर उन्होंने किताबी सिद्धांतों के साथ-साथ ईमानदारी और जवाबदेही से जुड़ी सच्ची घटनाओं को भी साझा किया। उन्होंने युवाओं को एक सीधा मंत्र दिया कि जब अंतरात्मा का स्पष्ट जवाब नहीं हो तो कभी भी हां नहीं कहना चाहिए। उन्होंने व्हिसल ब्लोअर्स की भूमिका, रेगुलेटरी कैप्चर यानी नियामकीय संस्थाओं पर कंपनियों के बढ़ते प्रभाव और कॉर्पोरेट ढांचे में नैतिक नेतृत्व की जरूरत पर भी विस्तार से चर्चा की।
दिन की दूसरी विशेष बातचीत सीमा सड़क संगठन में सचिव के तौर पर तैनात आईएएस अधिकारी डॉ. राजेंद्र कुमार ने की। मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए डीजी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने बताया कि डॉ. कुमार ने ही मोबाइल सेवा प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की और उसे लागू किया था, जिसे 2014 में संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कार मिला था। इस प्रोजेक्ट ने सरकारी सेवाओं को मोबाइल डिवाइस पर उपलब्ध कराकर नागरिकों के लिए डिजिटल पहुंच का दायरा कई गुना बढ़ा दिया था और लाखों भारतीयों के लिए सरकारी सेवाओं को अधिक सुलभ, सुरक्षित और कुशल बनाया था।
अपने व्याख्यान में डॉ. राजेंद्र कुमार ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस, साइबर सुरक्षा, पर्सनल डेटा सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट जैसे विषयों पर बात रखी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मूल सोच पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इसका मूल संदेश लगातार नवाचार, सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशन, जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल और भरोसे के साथ शासन है। उन्होंने एआई नीति के चार स्तंभों की व्याख्या की, जिसमें पहला स्तंभ सरकार, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग से एआई आधारित शोध, उद्यमशीलता और संस्थागत बदलाव को बढ़ावा देना है। दूसरा स्तंभ समावेशी विकास है जो साधन संपन्न और साधन विहीन के बीच की खाई को पाटता है। तीसरा स्तंभ जिम्मेदारी का है, जो यह सुनिश्चित करता है कि एआई नैतिक, सुरक्षित, पारदर्शी, निष्पक्ष और मानव केंद्रित हो और इसमें गोपनीयता, पक्षपात और जवाबदेही के लिए सुरक्षा उपाय हों। चौथा स्तंभ शासन से जुड़ा है, जिसमें स्पष्ट जवाबदेही, मानदंड, निगरानी, ऑडिट और शिकायत समाधान के साथ अनुकूल नियामकीय तंत्र विकसित करना शामिल है।
उन्होंने नए कॉर्पोरेट ट्रस्ट इक्वेशन को भी समझाया, जो चार आपस में जुड़े स्तंभों पर टिका है। अच्छा शासन जवाबदेही बनाता है, साइबर सुरक्षा मजबूती देती है, पर्सनल डेटा सुरक्षा भरोसे को बढ़ाती है और जिम्मेदार एआई टिकाऊ नवाचार को संभव बनाता है। ये सभी मिलकर एक आधुनिक कॉर्पोरेट इकोसिस्टम की नींव रखते हैं, जहां संगठन न केवल कुशल और इनोवेटिव होते हैं बल्कि पारदर्शी, सुरक्षित, नैतिक और जवाबदेह भी होते हैं। स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट पर उन्होंने कहा कि जीआईएस मैपिंग, ड्रोन निरीक्षण और डिजिटल डैशबोर्ड के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से सीमा बुनियादी ढांचे के निर्माण की गुणवत्ता पर बेहतर निगरानी हो सकती है और फंड व कार्यबल का सही उपयोग सुनिश्चित होता है।

