उत्तराखंड के कुंजापुरी मेले में पंजाबी गायक से भिड़े कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, वायरल वीडियो के बाद संगीत जगत दो हिस्सों में बंटा; मीका सिंह, कपिल शर्मा और बादशाह ने जताई नाराजगी, तो गायिका सोना महापात्रा ने उठाया कलाकार की जवाबदेही का सवाल
साईडलुक, विशेष। एक कलाकार, हजारों की उम्मीदें, लाखों रुपये के भुगतान का दावा और मंच पर सरेआम हुई तीखी बहस। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में आयोजित कुंजापुरी मेले में पंजाबी गायक दलेर मेहंदी के साथ हुए घटनाक्रम ने मनोरंजन जगत से लेकर आम लोगों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या किसी कलाकार की प्रस्तुति उम्मीद के मुताबिक नहीं होने पर सार्वजनिक मंच से उसकी बेइज्जती करना उचित है, या सरकारी धन से आयोजित कार्यक्रम में जनता को बेहतर प्रस्तुति दिलाने के लिए आयोजकों का सवाल उठाना जरूरी है?
18 अक्टूबर 2026 को हुए इस घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री और नरेंद्रनगर के विधायक सुबोध उनियाल चर्चा के केंद्र में आ गए। वीडियो में मंत्री दलेर मेहंदी की गायकी और मंच पर उनकी स्थिति पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं। मंत्री ने आरोप लगाया कि गायक ठीक से बोल नहीं पा रहे थे और उन्हें शराब के नशे में होने का संदेह था। दूसरी ओर, दलेर मेहंदी के समर्थन में संगीत और फिल्म जगत की कई जानी-मानी हस्तियां सामने आईं। उन्होंने कलाकार के साथ सार्वजनिक रूप से इस तरह पेश आने पर आपत्ति जताई और उनकी सेहत से जुड़ी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखने की बात कही।
यह मामला अब केवल एक लाइव शो की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रह गया है। इसके केंद्र में कलाकार का सम्मान, आयोजकों की जिम्मेदारी, सरकारी खर्च में पारदर्शिता और सार्वजनिक जीवन में पद की मर्यादा जैसे सवाल भी हैं।
आखिर उस रात मंच पर हुआ क्या था?
यह पूरा विवाद उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में आयोजित सिद्धपीठ मां कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रम से जुड़ा है। रविवार, 18 अक्टूबर की शाम दलेर मेहंदी मंच पर प्रस्तुति दे रहे थे। इसी दौरान उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल मंच पर पहुंचे और गायक की प्रस्तुति पर नाराजगी जताने लगे।
वायरल वीडियो में मंत्री को यह कहते सुना जा सकता है कि जब गायक ठीक से बोल नहीं पा रहे हैं तो गाना कैसे गाएंगे। उन्होंने कार्यक्रम के लिए बड़ी रकम खर्च किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि दर्शक दलेर मेहंदी को सुनने आए हैं, उनकी टीम को नहीं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रस्तुति वास्तविक लाइव गायन थी या रिकॉर्डेड ट्रैक पर आधारित थी।
मंत्री ने बाद में मीडिया से बातचीत में अपने हस्तक्षेप का बचाव किया। उनका कहना था कि दलेर मेहंदी की स्थिति सामान्य नहीं लग रही थी और वे उम्मीद के मुताबिक प्रस्तुति नहीं दे पा रहे थे। मंत्री ने शराब के नशे में होने का आरोप भी लगाया। हालांकि, उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला कोई चिकित्सकीय परीक्षण या अन्य निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय मंत्री का आरोप ही माना जाना चाहिए।
कौन हैं सुबोध उनियाल, जिनके व्यवहार पर देशभर में चर्चा है?
सुबोध उनियाल उत्तराखंड की राजनीति के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे नरेंद्रनगर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ, बाद में वे भाजपा में शामिल हुए।
सुबोध उनियाल का राजनीतिक इतिहास देखें तो वे पहली बार 2002 में कांग्रेस के टिकट पर नरेंद्रनगर से विधायक चुने गए थे। 2007 के विधानसभा चुनाव में वे उत्तराखंड क्रांति दल के उम्मीदवार ओमगोपाल रावत से कथित तौर पर महज चार मतों से हार गए। 2012 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर फिर जीत हासिल की। वर्ष 2016 में कांग्रेस के भीतर राजनीतिक उठापटक के दौरान वे भाजपा में चले गए और 2017 तथा 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के टिकट पर नरेंद्रनगर से जीत दर्ज की। इस तरह उनका राजनीतिक अनुभव चार विधानसभा जीतों तक पहुंचता है।
उनियाल की पहचान केवल विधायक के रूप में नहीं, बल्कि राज्य सरकार में मंत्री और राजनीतिक प्रवक्ता की भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में भी रही है। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि वे किसी निजी दर्शक की तरह नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद पर रहते हुए एक सरकारी-संबद्ध सांस्कृतिक आयोजन के मंच पर पहुंचे थे।
यहां सवाल उनकी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा का नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवहार के मानक का है। यदि किसी कलाकार की प्रस्तुति में गंभीर कमी थी, तो आयोजक उस पर सवाल उठा सकते हैं। लेकिन क्या उस शिकायत को मंच पर इस तरह व्यक्त करना जरूरी था? यही प्रश्न इस विवाद की सबसे संवेदनशील कड़ी बन गया है।
कितनी फीस पर बुलाए गए थे दलेर मेहंदी? 35 और 40 लाख के दावों पर भी सवाल
विवाद के बीच कार्यक्रम की लागत चर्चा में आ गई है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में दलेर मेहंदी की फीस को लेकर अलग आंकड़े सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में लगभग 35 लाख रुपये का उल्लेख है, जबकि एक रिपोर्ट में करीब 40 लाख रुपये की रकम बताई गई है। मंत्री ने भी कहा कि कलाकार की फीस के अलावा यात्रा और ठहरने की व्यवस्था पर खर्च किया गया था।
इन आंकड़ों के बीच अंतर को देखते हुए यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी एक राशि का भुगतान आधिकारिक दस्तावेजों से अंतिम रूप से प्रमाणित हो चुका है। उपलब्ध खबरों में आयोजन समिति का अनुबंध, भुगतान की रसीद, बिल या संबंधित सरकारी व्यय का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुआ है।
यदि कार्यक्रम पर सरकारी धन खर्च किया गया, तो पारदर्शिता के लिहाज से यह जानकारी सामने आनी चाहिए कि कलाकार के साथ कितनी फीस तय हुई, वास्तविक भुगतान कितना किया गया, यात्रा एवं आवास पर कितना खर्च हुआ और भुगतान किस बजट या मद से किया गया। इससे न केवल विवाद की एक बड़ी वजह स्पष्ट होगी, बल्कि जनता को यह भी पता चलेगा कि सार्वजनिक आयोजनों पर खर्च किए गए धन का हिसाब कैसे रखा जाता है।
इसी मुद्दे पर दलेर मेहंदी के भाई और गायक मीका सिंह ने भी सवाल उठाए। उन्होंने मंत्री से भुगतान की रसीद और रकम के प्रमाण सार्वजनिक करने की मांग की। इस तरह विवाद कलाकार के व्यवहार से आगे बढ़कर सार्वजनिक खर्च की जवाबदेही तक पहुंच गया।
कला जगत में नाराजगी, मीका सिंह से अनुपम खेर तक ने उठाई आवाज
दलेर मेहंदी के साथ हुए इस घटनाक्रम के बाद संगीत और फिल्म जगत की कई हस्तियों ने उनका समर्थन किया। उनके छोटे भाई और गायक मीका सिंह ने शराब पीने के आरोप को चुनौती देते हुए कहा कि यदि कोई उनके भाई के शराब सेवन का प्रमाण दे सके, तो वे गायन छोड़ने तक को तैयार हैं। मीका ने यह भी बताया कि दलेर मेहंदी की हाल में बड़ी सर्जरी हुई थी और संभव है कि उनकी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का असर प्रस्तुति पर पड़ा हो। हालांकि, सर्जरी की प्रकृति और कार्यक्रम के समय उनकी वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
अभिनेता और हास्य कलाकार कपिल शर्मा ने भी दलेर मेहंदी के समर्थन में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि गायक की गंभीर सर्जरी के बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं है और किसी दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों को जाने बिना उसके प्रति कठोर नहीं होना चाहिए।
रैपर बादशाह ने एक वरिष्ठ कलाकार को सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने पर निराशा जताई। उनका तर्क था कि किसी प्रस्तुति से असंतुष्ट होने पर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है, लेकिन उस कलाकार की गरिमा को ठेस पहुंचाना उचित नहीं है। गायिका हर्षदीप कौर ने भी दलेर मेहंदी का समर्थन करते हुए आशंका जताई कि उस दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं रही होगी।
अभिनेता अनुपम खेर ने भी इस विवाद में दलेर मेहंदी के पक्ष में आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि वे गायक को लगभग 25 से 30 वर्षों से जानते हैं और अपने अनुभव के आधार पर उनके शराब पीने की बात से सहमत नहीं हैं। खेर ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर इस तरह संबोधित करना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे स्वयं उस कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे, इसलिए वहां वास्तव में क्या हुआ, इसकी प्रत्यक्ष गवाही नहीं दे सकते।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि मनोरंजन जगत में बड़ी संख्या में लोग कलाकार के सम्मान और उसके स्वास्थ्य को लेकर संवेदनशीलता बरतने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, किसी कलाकार के मित्र या सहयोगी का समर्थन अपने आप में उस रात की पूरी घटना का स्वतंत्र प्रमाण नहीं बन जाता। घटना की निष्पक्ष समीक्षा के लिए दोनों पक्षों की बात और उपलब्ध साक्ष्यों को देखना जरूरी है।
सोना महापात्रा ने उठाया अलग सवाल, क्या दर्शकों की जवाबदेही भी जरूरी नहीं?
इस विवाद में गायिका सोना महापात्रा की प्रतिक्रिया ने बहस को एक नया आयाम दिया। उन्होंने कलाकार को सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने के तरीके पर सवाल उठाने के साथ-साथ यह भी कहा कि किसी वरिष्ठ कलाकार की प्रतिष्ठा का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि उसकी प्रस्तुति की गुणवत्ता पर चर्चा ही न हो।
सोना महापात्रा ने इस वर्ष दिल्ली में आयोजित सूफी हेरिटेज फेस्टिवल में दलेर मेहंदी की प्रस्तुति का अपना अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, उस कार्यक्रम में भी उन्हें गायक की प्रस्तुति उम्मीद के अनुरूप नहीं लगी थी। उन्होंने बताया कि वे और उनकी टीम निराश हुए थे, लेकिन उस समय वरिष्ठ कलाकार के प्रति सम्मान के कारण उन्होंने सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की।
सोना का सवाल यह है कि जब आयोजक किसी कलाकार को बुलाने के लिए समय, पैसा और प्रतिष्ठा लगाते हैं, तो क्या उन्हें बेहतर प्रस्तुति की अपेक्षा रखने का अधिकार नहीं है? उन्होंने कलाकार की गरिमा और पेशेवर जवाबदेही, दोनों को जरूरी बताया। उनके विचार में, यदि कलाकार अस्वस्थ है तो परिस्थिति को संवेदनशीलता से संभालना चाहिए, लेकिन दर्शकों की अपेक्षाओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने बहस को केवल मंत्री बनाम कलाकार के विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया। अब चर्चा इस बात पर भी है कि किसी कलाकार की वर्षों की उपलब्धियों का सम्मान करते हुए उसकी मौजूदा प्रस्तुति की गुणवत्ता पर निष्पक्ष सवाल कैसे उठाए जाएं।
सुबोध उनियाल ने भी रखा अपना पक्ष, कहा-अस्वस्थ थे तो कार्यक्रम स्वीकार नहीं करना चाहिए था
विवाद बढ़ने के बाद सुबोध उनियाल ने अपने व्यवहार का बचाव किया। उनका कहना था कि दलेर मेहंदी एक बड़े कलाकार हैं और इसी वजह से उन्हें कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। मंत्री के मुताबिक, यदि कलाकार शारीरिक रूप से प्रस्तुति देने में सक्षम नहीं थे, तो उन्हें कार्यक्रम स्वीकार करने से पहले इसकी जानकारी आयोजकों को देनी चाहिए थी।
उनियाल ने भुगतान, यात्रा, होटल और आयोजन की तैयारियों का हवाला देते हुए कहा कि कलाकार से अपेक्षा थी कि वह अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रस्तुति देंगे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि धार्मिक आयोजन के दौरान मर्यादा बनाए रखना आवश्यक था। बाद की रिपोर्टों में मंत्री की ओर से यह भी कहा गया कि उन्होंने आयोजन समिति के प्रतिनिधि के तौर पर सवाल उठाया और लोगों की नाराजगी के बीच हस्तक्षेप किया।
मंत्री के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि आयोजक और दर्शक अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप प्रस्तुति न मिलने पर जवाब मांग सकते हैं। लेकिन सवाल उठाने का अधिकार और सवाल उठाने का तरीका दो अलग बातें हैं। यदि किसी कलाकार के प्रदर्शन पर गंभीर आपत्ति थी, तो कार्यक्रम रोककर आयोजकों के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई जा सकती थी, भुगतान संबंधी शर्तों की समीक्षा हो सकती थी और जरूरत पड़ने पर आगे की कार्रवाई की जा सकती थी।
दूसरी ओर, कलाकार की प्रसिद्धि भी उसे पेशेवर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। यदि अनुबंध में लाइव गायन की शर्त थी और उसका पालन नहीं हुआ, तो आयोजकों को इस पर स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन यह तय करने के लिए कि वास्तव में अनुबंध का उल्लंघन हुआ या नहीं, संबंधित दस्तावेजों और प्रस्तुति के पूरे संदर्भ की जरूरत है।
आम लोग क्या कह रहे हैं? सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग नजरिए
इस विवाद को लेकर आम लोगों की प्रतिक्रिया को एक ही राय में समेटना सही नहीं होगा। वायरल वीडियो पर चर्चा और मीडिया में सामने आई प्रतिक्रियाओं से दो प्रमुख दृष्टिकोण उभरते हैं। एक पक्ष मंत्री के हस्तक्षेप को अनुचित सार्वजनिक व्यवहार मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कार्यक्रम की गुणवत्ता और खर्च किए गए धन के हिसाब को प्राथमिकता दे रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों से पूरे देश की जनभावना का कोई प्रतिनिधिक सर्वेक्षण सामने नहीं आया है, इसलिए यह दावा करना भी गलत होगा कि सभी लोग किसी एक पक्ष के साथ हैं।
दलेर मेहंदी के समर्थन में खड़े लोगों का कहना है कि कलाकार को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए था। यदि वह अस्वस्थ थे, तो उनकी स्थिति समझने की कोशिश की जानी चाहिए थी। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति पर शराब पीने जैसा आरोप लगाना गंभीर बात है और बिना प्रमाण सार्वजनिक रूप से ऐसा आरोप लगाने से उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है।
दूसरी ओर, मंत्री के रुख का समर्थन करने वाले लोगों का तर्क है कि बड़े नाम और प्रसिद्धि के आधार पर किसी भी कलाकार को अपनी पेशेवर जिम्मेदारी से छूट नहीं मिल सकती। यदि सार्वजनिक धन से आयोजित कार्यक्रम में कलाकार को बड़ी फीस दी गई थी, तो दर्शकों को गुणवत्तापूर्ण प्रस्तुति मिलने की अपेक्षा स्वाभाविक है। इस पक्ष के अनुसार, धार्मिक मेले में आमंत्रित कलाकार को कार्यक्रम की प्रकृति और दर्शकों की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
लेकिन इन दोनों विचारों के बीच एक तीसरा और अधिक संतुलित रास्ता भी है। कलाकार से जवाबदेही मांगी जाए, खर्च का हिसाब सार्वजनिक हो और किसी भी तरह की शिकायत का समाधान गरिमा बनाए रखते हुए किया जाए। न तो कलाकार की प्रतिष्ठा के नाम पर सवालों को दबाया जाना चाहिए और न ही पद या सार्वजनिक नाराजगी के आधार पर किसी व्यक्ति को अपमानित करने को उचित ठहराया जाना चाहिए।
धार्मिक मेले की मर्यादा और कलाकार के सम्मान के बीच संतुलन जरूरी
कुंजापुरी मेला केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, स्थानीय परंपरा और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। ऐसे आयोजनों में मंच पर मौजूद हर व्यक्ति से अपेक्षा रहती है कि वह आयोजन की गरिमा का ध्यान रखे। यही अपेक्षा आयोजकों, जनप्रतिनिधियों और आमंत्रित कलाकारों पर भी समान रूप से लागू होती है।
यदि किसी प्रस्तुति को लेकर शिकायत थी, तो आयोजकों को उस पर कार्रवाई करने का अधिकार था। लेकिन किसी जनप्रतिनिधि का सार्वजनिक मंच पर पहुंचकर कलाकार को फटकारना उस समय उपस्थित लोगों के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। किसी कलाकार के व्यवहार पर आपत्ति और उसकी व्यक्तिगत गरिमा के बीच अंतर बनाए रखना सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण कसौटी है।
इसी तरह कलाकारों को भी यह समझना होगा कि प्रशंसकों का प्यार और पुरानी उपलब्धियां उनकी पेशेवर प्रतिबद्धताओं को समाप्त नहीं करतीं। यदि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, तो आयोजकों को समय रहते सूचित करना, प्रस्तुति के स्वरूप में बदलाव पर सहमति लेना या आवश्यक होने पर कार्यक्रम स्थगित करना बेहतर विकल्प हो सकता है।
अब सबसे जरूरी सवाल: आरोपों की निष्पक्ष जांच और भुगतान का हिसाब कौन देगा?
दलेर मेहंदी और सुबोध उनियाल के बीच हुए इस विवाद का निष्पक्ष समाधान केवल वायरल वीडियो के आधार पर नहीं निकल सकता। इसके लिए पूरे कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग, आयोजकों का पक्ष, कलाकार के साथ हुए अनुबंध और भुगतान संबंधी दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे। शराब के नशे में होने के आरोप को भी बिना स्वतंत्र प्रमाण के तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
यदि फीस के रूप में 35 लाख या 40 लाख रुपये दिए जाने की चर्चा है, तो आयोजन समिति को वास्तविक अनुबंधित राशि और भुगतान का विवरण स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि क्या कार्यक्रम में लाइव गायन की अनिवार्य शर्त थी और यदि थी, तो उसके पालन का आकलन किस आधार पर किया गया।
मंत्री की भूमिका और उनके व्यवहार की समीक्षा भी इसी निष्पक्षता से होनी चाहिए। जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं को सामने रख सकते हैं, लेकिन उनसे यह अपेक्षा भी रहती है कि वे असहमति और शिकायत को संयमित भाषा में व्यक्त करें। सार्वजनिक पद की गरिमा केवल सख्ती दिखाने से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में संतुलित व्यवहार से भी बनती है।
सवाल सिर्फ दलेर मेहंदी का नहीं, हमारे सार्वजनिक व्यवहार का भी है
दलेर मेहंदी और सुबोध उनियाल के बीच हुआ घटनाक्रम एक व्यापक बहस को जन्म देता है। कलाकार की दशकों की उपलब्धियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन दर्शकों और आयोजकों की अपेक्षाओं को भी महत्व मिलना चाहिए। इसी तरह जनता के धन का हिसाब पारदर्शी होना चाहिए, लेकिन जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया में व्यक्तिगत सम्मान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस विवाद में सबसे उचित रास्ता यही है कि आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर वास्तविक तथ्यों को सामने लाया जाए। कलाकार की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, प्रस्तुति की शर्तों, फीस और आयोजकों की जिम्मेदारी से जुड़े सवालों का जवाब दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर दिया जाए। साथ ही, यह संदेश भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी व्यक्ति की गलती पर सवाल उठाना और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना एक ही बात नहीं है।
कला का सम्मान जरूरी है, जनता के पैसे की जवाबदेही भी जरूरी है और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

