मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के जनपद पंचायत बजाग अंतर्गत ग्राम पंचायत पिपरिया के पोषक ग्राम सेंदुरखार और खराईलटोला के आदिवासी बैगा परिवार आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित हैं। दोनों गांवों में करीब 75 घरों में 450 से अधिक की आबादी निवास करती है, लेकिन यहां न तो हैंडपंप की सुविधा है और न ही नल-जल योजना का लाभ मिला है। स्थिति ऐसी है कि ग्रामीणों को मजबूरी में जंगलों के बीच बनी झिरिया का पानी पीना पड़ रहा है। यह झिरिया चारों ओर गाजर घास और खरपतवार से घिरी हुई है, जिससे पानी पूरी तरह असुरक्षित और दूषित है।
बरसात के दिनों में इस गंदे पानी से ग्रामीणों में उल्टी-दस्त और बुखार जैसी बीमारियां फैल रही हैं। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण लोगों को इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है और उनकी मेहनत की कमाई इलाज में खर्च हो रही है।
ग्रामीण किसानिन बाई बताती हैं कि वे रोज इसी झिरिया का पानी पीते हैं, जिसके चलते अक्सर बीमार पड़ जाते हैं क्योंकि गांव में एक भी हैंडपंप नहीं है। वहीं क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि लोकेश पटेरिया ने कहा कि बीस साल से भाजपा की सरकार है लेकिन अब तक बैगा आदिवासी परिवारों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जा सका है, जिससे शासन के वादों की पोल खुल रही है।
खनिज संपदा से भरपूर इस क्षेत्र में शुद्ध पेयजल न मिलना प्रशासन और सरकार के विकास दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आजादी के सात दशक बाद भी आदिवासी परिवारों का गंदे झिरिया पानी पर निर्भर रहना साफ तौर पर दर्शाता है कि शासन-प्रशासन ने इस क्षेत्र को अब तक उपेक्षा की दृष्टि से देखा है।



