प्रेस की आज़ादी से लेकर कॉरपोरेट प्रभाव तक, भारतीय मीडिया की चुनौतियों पर वैश्विक रिपोर्टों की बड़ी तस्वीर
साईडलुक, सत्यजीत यादव। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, दुनिया के सबसे बड़े समाचार बाजारों में शामिल है और यहां सैकड़ों समाचार चैनल, हजारों अखबार तथा करोड़ों डिजिटल दर्शक मौजूद हैं। इसके बावजूद जब मीडिया स्वतंत्रता और पत्रकारिता की गुणवत्ता को लेकर वैश्विक सूचकांकों की बात आती है, तो भारत की स्थिति अक्सर बहस का विषय बन जाती है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2025 में भारत को 180 देशों में 151वां स्थान मिला। हालांकि यह 2024 की तुलना में कुछ सुधार माना गया, लेकिन भारत अब भी उन देशों की श्रेणी में शामिल है जहां प्रेस स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चुनौतियां बताई गई हैं।
कभी अखबारों का स्वर्णकाल, आज टीआरपी और एल्गोरिद्म का दौर
भारत की पत्रकारिता का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है। समाचार पत्र कभी जनजागरण और सत्ता से सवाल पूछने का प्रमुख माध्यम थे। लेकिन डिजिटल युग में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज समाचार संस्थानों पर विज्ञापन, कॉरपोरेट स्वामित्व, राजनीतिक ध्रुवीकरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म की प्रतिस्पर्धा का प्रभाव बढ़ा है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में आर्थिक दबाव को विश्वभर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है।
पड़ोसी देशों से तुलना में भारत कहां खड़ा है?
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2025 के अनुसार भारत 151वें स्थान पर रहा। पड़ोसी देशों में नेपाल 91वें, भूटान 79वें और श्रीलंका 135वें स्थान पर रहे। दूसरी ओर पाकिस्तान 152वें तथा बांग्लादेश 163वें स्थान पर रहे। चीन 177वें स्थान पर रहा, जो दुनिया के सबसे निचले देशों में शामिल है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों को मीडिया स्वतंत्रता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि नेपाल और भूटान जैसे कुछ देशों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है।
आखिर भारत की रैंकिंग नीचे क्यों रहती है?
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत की रैंकिंग को प्रभावित करने वाले कई कारण बताए जाते हैं। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा, कानूनी दबाव, मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों का उपयोग, मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, आर्थिक दबाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण शामिल हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए आर्थिक मॉडल कमजोर होने से मीडिया संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि भारत सरकार और कई मीडिया संगठनों का तर्क है कि भारत में विशाल और विविध मीडिया परिदृश्य मौजूद है, जहां हजारों प्रकाशन और सैकड़ों समाचार चैनल सक्रिय हैं तथा विभिन्न विचारधाराओं की आवाजें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
क्या केवल भारत में ही है यह समस्या?
बिल्कुल नहीं। विश्व स्तर पर भी मीडिया गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा है। 2026 की वैश्विक रिपोर्टों में कहा गया कि पिछले 25 वर्षों में प्रेस स्वतंत्रता का स्तर सबसे निचले स्तरों में पहुंच गया है। अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्रों में भी मीडिया पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव को लेकर चिंताएं व्यक्त की गई हैं।
पाकिस्तान में सोशल मीडिया और मीडिया नियमन को लेकर पत्रकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। वियतनाम, चीन, रूस और कई अन्य देशों में पत्रकारों पर नियंत्रण और प्रतिबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने चिंता जताई है।
टीवी बहस बनाम जमीनी रिपोर्टिंग
मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक यह है कि कई बार जमीनी मुद्दों की तुलना में स्टूडियो बहसों को अधिक महत्व दिया जाता है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे विषयों की तुलना में राजनीतिक टकराव और सनसनीखेज खबरें अधिक दर्शक आकर्षित करती हैं।
इसके पीछे केवल संपादकीय निर्णय ही नहीं बल्कि टीआरपी, विज्ञापन बाजार और डिजिटल क्लिक की प्रतिस्पर्धा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि पत्रकारिता की गुणवत्ता पर चर्चा आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई है।
आगे का रास्ता क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए संपादकीय स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा, पारदर्शी मीडिया स्वामित्व, तथ्य-जांच की मजबूत व्यवस्था और सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता, समाज और नागरिकों के बीच जवाबदेही सुनिश्चित करने का माध्यम भी है। यही कारण है कि मीडिया की गुणवत्ता पर होने वाली बहस केवल पत्रकारिता की नहीं बल्कि लोकतंत्र की सेहत की बहस भी मानी जाती है।

