राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर पूर्व मुख्यमंत्री का केंद्र और भाजपा पर तीखा हमला, पारदर्शिता की मांग तेज
साईडलुक, डेस्क। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे के कथित वित्तीय अनियमितता विवाद को लेकर राजनीतिक बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि “70 सालों का हिसाब मांगने वाले एक मंदिर के चढ़ावे का हिसाब नहीं दे पा रहे हैं।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब राम मंदिर में प्राप्त दान और चढ़ावे के लेखा-जोखा को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। उनका कहना था कि जब सरकार ऐतिहासिक घटनाओं और अतीत के मुद्दों पर लगातार जवाब मांगती रही है, तब वर्तमान में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे का स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब भी सामने आना चाहिए।
दूसरी ओर, राम मंदिर चढ़ावा विवाद की शुरुआत उन रिपोर्टों और आरोपों के बाद हुई जिनमें मंदिर परिसर में प्राप्त दान राशि और आभूषणों के लेखा-जोखा में कथित अनियमितताओं की बात कही गई। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वयं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा सके।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि मंदिर में प्राप्त चढ़ावे का नियमित ऑडिट कराया जाता है और वित्तीय प्रक्रियाएं निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती हैं। ट्रस्ट का कहना है कि तथ्यों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। ट्रस्ट ने यह भी कहा कि कई आरोप अपुष्ट हैं और जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा अब आस्था और जवाबदेही दोनों से जुड़ गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे पारदर्शिता का प्रश्न बताते हुए विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, जबकि भाजपा का कहना है कि मामला ट्रस्ट से संबंधित है और जांच प्रक्रिया पहले से चल रही है। भाजपा नेताओं का दावा है कि दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी तथा इस मामले का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े किसी भी धार्मिक संस्थान में वित्तीय पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष और समयबद्ध जांच न केवल संस्थान की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास को भी मजबूत करती है। फिलहाल पूरे मामले में अंतिम स्थिति जांच एजेंसियों की रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

