आईआईजी की नई पद्धति से पहली बार भारत क्षेत्र के 1000 किमी तक के आयनमंडल का पुनर्निर्माण, जीपीएस और नाविक प्रणाली को मिलेगा लाभ
साईडलुक, सत्यजीत यादव। पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष का सटीक मॉडल तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार भारत क्षेत्र के ऊपरी आयनमंडल का पुनर्निर्माण करने के लिए भू-आधारित और अंतरिक्ष-आधारित प्रेक्षणों को एकीकृत करने वाली एक नई पद्धति विकसित की है। यह पद्धति उपग्रह संचालन, संचार प्रणालियों तथा नौवहन सेवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगी।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान आईआईजी द्वारा विकसित इस नई विधि में कॉस्मिक रेडियो ऑकल्टेशन माप से प्राप्त स्केल ऊंचाई की ऊंचाई भिन्नता को बॉटमसाइड आयनोसॉन्ड प्रेक्षणों के साथ संयोजित किया गया है। इससे टॉपसाइड इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल का सटीक माप संभव हुआ है। अब तक विश्वसनीय जानकारी के अभाव में अधिकांश पूर्व अध्ययनों और पारंपरिक मॉडलों में आयनमंडल की ऊपरी सतह की माप ऊंचाई को स्थिर माना जाता था, जिससे त्रुटियां होती थीं।
आयनमंडल पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का एक जटिल, आयनीकृत भाग है जो वायुमंडलीय तथा आयनमंडलीय विद्युत-गतिकीय प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें इलेक्ट्रॉन घनत्व में होने वाले दैनिक परिवर्तन विभिन्न आवृत्ति बैंडों में रेडियो तरंगों के प्रसार को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से उच्च आवृत्ति बैंड में बहु-परावर्तित संकेतों के माध्यम से स्काईवेव प्रसार के जरिए लंबी दूरी तक रेडियो संचार संभव हो पाता है। इसके अतिरिक्त यह जीपीएस तथा भारत की नाविक उपग्रह-आधारित नौवहन प्रणालियों को भी संकेतों के प्रसारण में परिवर्तन के माध्यम से प्रभावित करता है।
भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में जहां आयनमंडल की गतिशीलता अत्यधिक जटिल होती है, लगभग 1000 किमी तक की सटीक इलेक्ट्रॉन घनत्व जानकारी आयनमंडल की निरंतर निगरानी के लिए आवश्यक है क्योंकि अधिकांश निम्न पृथ्वी कक्षा उपग्रह इसी ऊंचाई के भीतर कार्य करते हैं। यह विधि विशेष रूप से भूचुंबकीय भूमध्य रेखा पर महत्वपूर्ण है, जहां पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की ज्यामिति के कारण आयनमंडल की गतिशीलता अत्यधिक जटिल होती है।
के. सिबा किरण गुरु, एस. श्रीपति और आर.के. बरद द्वारा किया गया यह अध्ययन जमीनी और अंतरिक्ष आधारित प्रेक्षणों को प्रभावी ढंग से संयोजित करके भारतीय क्षेत्र के शीर्ष आयनमंडल के लक्षण वर्णन में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रस्तावित पद्धति विभिन्न अंतरिक्ष मौसम स्थितियों के तहत क्षेत्रीय आयनमंडल मॉडलिंग की सटीकता को बढ़ाती है। एजीयू रेडियो साइंस जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को अन्य क्षेत्रों में भी प्रयोग किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने तिरुनेलवेली के ऊपर आयनोग्राम और उससे संबंधित पुनर्निर्मित ऊर्ध्वाधर इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल का विश्लेषण कर विधि की मजबूती को प्रमाणित किया है। वर्ष 2014 के लिए मापी गई और पुनर्निर्मित घनत्वों के बीच सहसंबंध विश्लेषण तथा मौसमी इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल से भी इसकी सटीकता सिद्ध हुई है। यह प्रगति अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान क्षमताओं में सुधार और संचार एवं नौवहन प्रणालियों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चित्र A(a): तिरुनेलवेली के ऊपर एक विशिष्ट आयनोग्राम (आवृत्ति बनाम आभासी ऊँचाई प्लॉट) और उससे संबंधित पुनर्निर्मित ऊर्ध्वाधर इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल। प्लॉट में आभासी ऊँचाई प्रोफाइल (सियान), फिटेड वक्र (लाल डैश वाली रेखा), वास्तविक ऊंचाई का निचला भाग प्रोफाइल (काली ठोस रेखा), और दो ऊपरी भाग के पुनर्निर्मित प्रोफाइल दर्शाए गए हैं: α–चैपमैन (नीली ठोस रेखा) और एपस्टीन (गुलाबी ठोस रेखा)। स्वार्म इन-सीटू इलेक्ट्रॉन घनत्व को सत्यापन के लिए एक तारे से चिह्नित किया गया है।
चित्र A(b): प्रस्तावित टॉपसाइड पुनर्निर्माण पद्धति की मजबूती को मान्य करते हुए, वर्ष 2014 के लिए मापी गई और पुनर्निर्मित घनत्वों के बीच सहसंबंध विश्लेषण।
चित्र बी: वर्ष 2014 के लिए तिरुनेलवेली पर पुनर्निर्मित मौसमी इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल, समय क्षेत्रों के अनुसार वितरित।
इस विधि द्वारा प्रदान किए गए शीर्ष आयनमंडल के बेहतर पुनर्निर्माण से शीर्ष आयनमंडल की बेहतर समझ में सहायता मिलती है और शीर्ष पैमाने की ऊंचाई प्रवणता के अधिक सटीक क्षेत्र-विशिष्ट अनुमान प्रदान किए जाते हैं।

