जबलपुर के 78 गांवों में बायोमैट्रिक से मिल रहा पैसा, बुजुर्गों-दिव्यांगों को बड़ी राहत; क्षमा ठाकुर बनीं ‘बैंक वाली दीदी’
साईडलुक, जबलपुर। कभी पेंशन निकालने या बैंक का छोटा-सा काम कराने के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर शाखा तक जाना पड़ता था और घंटों लाइन में लगने के बाद भी पूरा दिन निकल जाता था। अब गांव में ही बायोमैट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाते ही कुछ मिनटों में बैंकिंग सेवाएं मिल रही हैं। यह बदलाव राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की बैंक सखियों की बदौलत आया है। बैंक सखियां न सिर्फ ग्रामीणों को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को ऋण उपलब्ध कराने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं।
जिले के 78 गांवों में अलग-अलग बैंकों से जुड़ी बैंक सखियां सेवाएं दे रही हैं। इनमें बड़खेरी गांव की क्षमा ठाकुर बैंक सखी के साथ कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन के रूप में भी महिलाओं को जागरूक कर रही हैं। कुछ वर्ष पहले तक क्षमा ठाकुर भी एक सामान्य गृहिणी थीं और बैंक से जुड़े कामों के लिए उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी बदली और उनकी सक्रियता को देखते हुए आजीविका मिशन ने उन्हें बैंक सखी के रूप में चयनित किया।
इंडियन बैंक के सहयोग से क्षमा ठाकुर को माइक्रो एटीएम, आधार आधारित भुगतान प्रणाली, डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय साक्षरता का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद क्षमा ठाकुर इंडियन बैंक से जुड़कर ग्रामीणों को नकदी निकासी, जमा, बैलेंस जांच और अन्य बैंकिंग सेवाएं गांव में ही उपलब्ध करा रही हैं। इसका सबसे अधिक लाभ बुजुर्गों, दिव्यांगों, महिलाओं और दूरदराज के ग्रामीणों को मिल रहा है। जिन लोगों का पूरा दिन बैंक जाने में खर्च हो जाता था, उनका काम अब कुछ ही मिनटों में पूरा हो जाता है।
शुरुआत में लोगों को डिजिटल लेन-देन और फिंगरप्रिंट आधारित बैंकिंग पर भरोसा नहीं था, लेकिन लगातार जागरूकता और सफल लेन-देन के बाद ग्रामीणों का विश्वास बढ़ा है। अब अधिकांश लोग बिना झिझक डिजिटल माध्यम से बैंकिंग सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। क्षमा ठाकुर ग्रामीणों को प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और अटल पेंशन योजना जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी देकर पात्र हितग्राहियों को इनसे जोड़ने का काम भी कर रही हैं।
बैंक सखी के रूप में मिलने वाले कमीशन से क्षमा ठाकुर के परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। बच्चों की पढ़ाई बेहतर तरीके से हो रही है और परिवार आत्मनिर्भर बना है। गांव में बैंकिंग या वित्तीय सलाह की जरूरत पड़ते ही लोग सबसे पहले ‘बैंक वाली दीदी’ के पास पहुंचते हैं। क्षमा ठाकुर कहती हैं कि उनका सपना है कि गांव की हर महिला डिजिटल बैंकिंग का उपयोग करना सीखे, ताकि किसी भी बैंकिंग कार्य के लिए उसे किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
मध्यप्रदेश आजीविका मिशन की जिला परियोजना प्रबंधक अंजुला मिश्रा बताती हैं कि पहले बैंक का छोटा-सा काम कराने में पूरा दिन लग जाता था। अब जिले के 78 गांवों में बैंक सखियां अलग-अलग बैंकों से जुड़कर ग्रामीणों को उनके गांव में ही बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं। उनके अनुसार यह पहल ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और डिजिटल बैंकिंग के विस्तार की सफल मिसाल बन चुकी है।

