सरकारी विद्यालयों से बढ़ती दूरी ने छेड़ी नई बहस, शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल
साईडलुक, (सत्यजीत यादव)। देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता लगातार बेहतर हो रही है, तो बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ अधिकारी और प्रभावशाली वर्ग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों के बजाय निजी विद्यालयों में पढ़ाना क्यों पसंद करते हैं। यह प्रश्न केवल किसी व्यक्ति की निजी पसंद तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में जनता के विश्वास, उसकी गुणवत्ता और नीति निर्माण की दिशा से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
हाल के वर्षों में विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और शिक्षा संबंधी आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि देश के अनेक राज्यों में सरकारी विद्यालयों में नामांकन घटा है, जबकि निजी विद्यालयों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ा है। केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि वर्ष 2023-24 में सरकारी स्कूलों के नामांकन में लगभग 87 लाख की कमी दर्ज हुई। सरकार का कहना है कि इसका प्रमुख कारण छात्र डेटा संग्रह की नई प्रणाली और डुप्लीकेट नामांकन हटाना है, जबकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता रुझान भी इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण है।
शिक्षा नीति के जानकारों का कहना है कि अभिभावक केवल भवन या सुविधाएं नहीं देखते, बल्कि शिक्षकों की नियमित उपलब्धता, अंग्रेजी माध्यम, डिजिटल शिक्षा, अनुशासन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और समग्र शैक्षणिक वातावरण को भी महत्व देते हैं। यही कारण है कि आर्थिक रूप से सक्षम परिवार, जिनमें अनेक जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं, निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि यह भी सच है कि देश के लाखों परिवार आज भी सरकारी विद्यालयों पर निर्भर हैं और अनेक सरकारी स्कूल उत्कृष्ट परिणाम भी दे रहे हैं।
नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जनप्रतिनिधि और नीति निर्माता स्वयं सरकारी विद्यालयों का अधिक उपयोग करें तो इससे जनता का विश्वास मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसी भी अभिभावक को अपने बच्चे के लिए विद्यालय चुनने की स्वतंत्रता है और केवल इस आधार पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। असली प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक सरकारी विद्यालय ऐसी गुणवत्ता प्रदान कर रहा है कि आम नागरिक बिना किसी संकोच के अपने बच्चों का प्रवेश वहां कराना चाहे।
देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले आंकड़े बताते हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक समान नहीं है। कुछ राज्यों में सरकारी विद्यालयों ने उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर सीखने का वातावरण विकसित किया है, जबकि कई स्थानों पर शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं का अभाव और घटता नामांकन चिंता का विषय बना हुआ है। यही असमानता सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच बढ़ती दूरी का एक बड़ा कारण मानी जा रही है।
शिक्षाविदों का मानना है कि यदि सरकारें वास्तव में सरकारी विद्यालयों को पहली पसंद बनाना चाहती हैं, तो केवल बजट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, जवाबदेह प्रशासन, आधुनिक संसाधन, पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित परिसर और सीखने के बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने होंगे। जब सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता पर समाज का व्यापक विश्वास मजबूत होगा, तब यह बहस स्वतः कमजोर पड़ सकती है कि जनप्रतिनिधियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ते।
शिक्षा केवल एक सरकारी सेवा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक नींव है। इसलिए यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर है जो देश के करोड़ों बच्चों का भविष्य तय करती है। यदि सरकारी विद्यालय आम नागरिक के साथ-साथ नीति निर्माताओं के लिए भी पहली पसंद बन जाएं, तो यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक होगी।

