साईडलुक, जबलपुर। बलदेवबाग चौराहे पर वर्ष 2025 में हुए चर्चित विवाद ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद पूर्व महापौर व बीजेपी नेता प्रभात साहू सहित पांच लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है। यह वही मामला है जिसमें ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात आरक्षक कृष्ण कुमार पाल को घटना के तुरंत बाद ही निलंबित कर दिया गया था।
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से बदली तस्वीर…
घटना के बाद प्रारंभिक स्तर पर पुलिस ने प्रकरण को “अज्ञात” आरोपियों के खिलाफ दर्ज किया था, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए। मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा, तो न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि वास्तविक आरोपियों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए। इसी के बाद पूर्व महापौर प्रभात साहू समेत अन्य को नामजद आरोपी बनाया गया।
2025 का बलदेवबाग चौराहा विवाद…
यह पूरा घटनाक्रम 18 सितंबर 2025 का है, जब लाड़गंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत बलदेवबाग चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस द्वारा वाहन चेकिंग अभियान चलाया जा रहा था। इसी दौरान प्रभात साहू को रोके जाने पर विवाद शुरू हुआ, जो देखते ही देखते धक्का-मुक्की और मारपीट में बदल गया। आरोप है कि समर्थकों की भीड़ बुलाकर स्थिति को और उग्र बनाया गया और शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न की गई।
आरक्षक पर पहले ही हो चुकी थी कार्रवाई…
घटना के दौरान ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात आरक्षक कृष्ण कुमार पाल द्वारा पूर्व महापौर को थप्पड़ मारने का वीडियो सामने आया था। इस घटना के तुरंत बाद ही पुलिस विभाग ने आरक्षक को निलंबित कर दिया था। विभागीय स्तर पर इसे अनुशासनहीनता मानते हुए तत्काल कार्रवाई की गई थी। हालांकि, उस समय यह भी सवाल उठा था कि एक पक्ष पर त्वरित कार्रवाई हुई, लेकिन दूसरे पक्ष पर कार्रवाई में देरी क्यों हुई।
लाड़गंज थाना बना जांच का केंद्र…
यह पूरा मामला लाड़गंज थाने में दर्ज हुआ था और वहीं से इसकी जांच आगे बढ़ी। शुरुआत में दर्ज प्रकरण में आरोपियों के नाम शामिल नहीं किए गए थे, लेकिन हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने संशोधित कार्रवाई करते हुए प्रभात साहू सहित पांच लोगों को नामजद आरोपी बनाया। अब इसी थाने के माध्यम से आगे की कानूनी प्रक्रिया और जांच जारी है।
किन-किन को बनाया गया नामजद आरोपी ?
इस मामले में प्रभात साहू के अलावा शुभम अवस्थी, महेंद्र रैकवार, विजय सोनी और अभिनंदन जायसवाल को भी नामजद आरोपी बनाया गया है। इन सभी पर मारपीट, धमकी, शासकीय कार्य में बाधा सहित अन्य धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज है।
वीडियो और गवाह बने अहम आधार…
घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया था। वीडियो में पुलिस और नेताओं के बीच झूमाझटकी और अभद्र व्यवहार के दृश्य सामने आए, जो बाद में जांच का महत्वपूर्ण आधार बने।
सियासी और प्रशासनिक सवाल फिर उठे…
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में कार्रवाई समान रूप से होती है। आरक्षक पर तत्काल निलंबन और नेताओं पर देरी से कार्रवाई ने उस समय भी विवाद खड़ा किया था, जो अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद फिर चर्चा में है।
अब आगे क्या ?
अब यह मामला न्यायालय की निगरानी में है और आगे की कार्रवाई जांच रिपोर्ट और साक्ष्यों के आधार पर तय होगी। संभावना है कि आने वाले समय में आरोपियों से पूछताछ, गिरफ्तारी या अन्य कानूनी प्रक्रिया तेज हो सकती है।
जबलपुर का यह मामला केवल एक ट्रैफिक विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक प्रभाव के टकराव का प्रतीक बन चुका है। हाईकोर्ट की सख्ती ने यह साफ कर दिया है कि देर से ही सही, लेकिन कानून अपना काम करता है।
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