प्रदर्शन की कवरेज के दौरान रिपोर्टर पर हमला, पत्रकार संगठनों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने की घटना की निंदा
साईडलुक, डेस्क। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन की कवरेज के दौरान टाइम्स नाउ नवभारत के पत्रकार देव कोटक पर कथित हमले की घटना ने मीडिया की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी तेजी से वायरल हुई, जिसमें कहा गया कि “जो नफरत स्टूडियो से फैला रही है, उसका खामियाज़ा फील्ड में टाइम्स नाउ के पत्रकार को भुगतना पड़ रहा है।” यह टिप्पणी अलग-अलग विचारों के साथ व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि यह एक राय (Opinion) है, न कि कोई स्थापित तथ्य।
मंगलवार को जंतर-मंतर पर चल रहे एक प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकार देव कोटक के साथ कथित रूप से भीड़ ने धक्का-मुक्की और मारपीट की। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने उन्हें घेर लिया, जिससे उनके कपड़े फट गए। पत्रकार ने यह भी आरोप लगाया कि उनका मोबाइल फोन और घड़ी छीन ली गई। घटना के बाद सामने आए वीडियो और तस्वीरों में उनकी फटी हुई शर्ट दिखाई दी, जिसके बाद पत्रकारिता जगत में इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
घटना के बाद कई वरिष्ठ पत्रकारों, मीडिया संस्थानों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने पत्रकार पर हुए हमले की निंदा की। विभिन्न प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि किसी भी पत्रकार पर केवल इसलिए हमला नहीं किया जा सकता क्योंकि लोग उसके संस्थान या उसकी रिपोर्टिंग से असहमत हैं। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक बताया तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।
सोशल मीडिया पर घटना को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। कुछ लोगों ने मीडिया संस्थानों की संपादकीय नीतियों पर सवाल उठाए, जबकि अनेक लोगों ने स्पष्ट कहा कि किसी भी परिस्थिति में हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की आलोचना का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन पत्रकारों पर शारीरिक हमला कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों दोनों के विरुद्ध माना जाता है।
भारत सहित दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया पर बढ़ती आक्रामकता और वैचारिक टकराव का असर अब मैदान में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर भी दिखाई देने लगा है। ऐसे माहौल में किसी भी पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता के वातावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या असहमति व्यक्त करने का तरीका हिंसा हो सकता है। लोकतंत्र में विचारों का जवाब विचारों से दिया जाता है, न कि मारपीट से। विशेषज्ञों का कहना है कि मीडिया संस्थानों की आलोचना और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन किसी पत्रकार को निशाना बनाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

