20 बागी सांसदों को नोटिस से लेकर बैंक खातों पर अदालत की राहत तक, ममता बनर्जी के सामने हार के बाद भी संघर्ष की नई जमीन; कांग्रेस विलय की चर्चा को पार्टी ने बताया अफवाह
साईडलुक, (सत्यजीत यादव)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई का दिन भले ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद बड़ा झटका लेकर आया हो, लेकिन चुनावी पराजय के बाद भी बंगाल की राजनीति से ‘दीदी’ की मौजूदगी खत्म नहीं हुई है। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 294 में से 207 सीटें जीतकर सत्ता परिवर्तन किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को दो सीटें मिलीं। यानी चुनावी गणित पूरी तरह बीजेपी के पक्ष में चला गया, लेकिन चुनाव परिणाम के कुछ महीनों बाद राज्य की राजनीति जिस तरह करवट ले रही है, उसने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ को चुनावी हार के साथ समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी।
4 मई को चुनाव नहीं, चुनाव परिणाम आया था
सबसे पहले तारीख को लेकर तस्वीर साफ करना जरूरी है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मतदान दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को हुआ था। 294 विधानसभा सीटों की मतगणना 4 मई को हुई और उसी दिन परिणाम सामने आया। चुनाव आयोग के अनुसार बीजेपी को 207, तृणमूल कांग्रेस को 80, कांग्रेस को दो, जबकि अन्य दलों को शेष सीटें मिलीं। इसलिए यह कहना कि “4 मई को चुनाव हार गईं” तकनीकी रूप से सही नहीं है; 4 मई को मतगणना और परिणाम घोषित हुए थे।
चुनाव में बीजेपी की बढ़त मामूली नहीं थी। 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है और बीजेपी 207 सीटों के साथ इस आंकड़े से 59 सीट आगे रही। दूसरी तरफ TMC 80 सीटों तक सीमित रही। यह परिणाम बंगाल की राजनीति में एक बड़े सत्ता परिवर्तन का संकेत था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
पहला मोर्चा: 20 बागी सांसदों पर अयोग्यता की तलवार
चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा राजनीतिक संकट उसके संसदीय संगठन में दिखाई दिया। पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में जाने वाले 20 सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू हुई।
तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी ने इन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग को लेकर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दी थी। मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद लोकसभा सचिवालय ने 20 सांसदों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। नोटिस में सांसदों से निर्धारित समय में अपना पक्ष रखने को कहा गया था।
हालांकि यहां भी एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। यह कहना कि “सुप्रीम कोर्ट ने 20 सांसदों को अयोग्य कर दिया” अभी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की प्रक्रिया को लेकर हस्तक्षेप किया और कार्यवाही में तेजी की दिशा में बात हुई, जबकि अंतिम अयोग्यता का फैसला संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के तहत होना है।
यानी फिलहाल इसे ममता की कानूनी जीत कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि TMC ने अपने बागी सांसदों के खिलाफ औपचारिक लड़ाई को आगे बढ़ा दिया है।
दूसरा मोर्चा: बगावत के बाद ‘घर वापसी’ की राजनीति
चुनाव के बाद TMC में बगावत और पुनर्गठन दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। कुछ नेताओं और विधायकों के ममता खेमे के करीब आने की चर्चाओं ने बंगाल के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ाई है।
हालांकि “तीन विधायक औपचारिक रूप से TMC में वापस आ चुके हैं” वाले दावे की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि फिलहाल पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है। कुछ रिपोर्टों में तीन विद्रोही विधायकों द्वारा ममता बनर्जी के पक्ष में सार्वजनिक रुख अपनाने और मुख्यधारा TMC नेतृत्व के साथ संपर्क की बात सामने आई है, लेकिन इसे तीन विधायकों की आधिकारिक वापसी के बराबर मानना उचित नहीं होगा।
इसका राजनीतिक महत्व फिर भी कम नहीं है। क्योंकि चुनावी हार के बाद किसी पार्टी में सबसे बड़ा सवाल केवल सीटों का नहीं होता, बल्कि संगठन के भीतर नेतृत्व को लेकर विश्वास का होता है। अगर बागी खेमे में दरार पड़ती है और नेता वापस ममता के साथ आते हैं तो यह बीजेपी के लिए संगठनात्मक चुनौती बन सकती है।
तीसरा मोर्चा: बैंक खातों पर अदालत से राहत, लेकिन पूरी आजादी नहीं
TMC के लिए दूसरा बड़ा कानूनी मोर्चा उसके बैंक खातों को लेकर रहा। पार्टी के कुछ बैंक खातों पर कार्रवाई के बाद मामला कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने जुलाई में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC को तीन HDFC बैंक खातों से सीमित खर्च करने की अनुमति दी थी। यह अनुमति पार्टी के रोजमर्रा के प्रशासनिक खर्च और कानूनी खर्च के लिए थी और इसके लिए अदालत ने निगरानी की व्यवस्था भी की थी।
रिपोर्टों के मुताबिक इन खातों में करीब 440 करोड़ रुपये की राशि का उल्लेख सामने आया। लेकिन इसे “ममता को पूरा खजाना वापस मिल गया” कहना सही नहीं होगा।
मामला आगे भी उलझा क्योंकि प्रवर्तन निदेशालय ने इन्हीं खातों को मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत फ्रीज किया। बाद में हाईकोर्ट ने TMC को अंतरिम रूप से पूर्ण संचालन की अनुमति देने से इनकार भी किया। यानी अदालत से मिली राहत राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर थी, लेकिन इसे खातों पर बिना शर्त नियंत्रण की बहाली नहीं कहा जा सकता।
चौथा मोर्चा: सड़क पर उतरीं ममता, क्या ‘दीदी फैक्टर’ अभी जिंदा है?
चुनावी हार के बाद कुछ समय तक अपेक्षाकृत शांत रहने के बाद ममता बनर्जी फिर सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय दिखाई दे रही हैं।
3 सितंबर को उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों और जनता को संबोधित किया तथा SIR, चुनावी प्रक्रिया, राजनीतिक कार्यालयों पर कथित कब्जे, पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दे उठाए। उन्होंने करीब 4,000 TMC कार्यालयों पर कथित कब्जे का आरोप भी लगाया और दिल्ली में आंदोलन की चेतावनी दी। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर जरूरी है, लेकिन उनका राजनीतिक संदेश स्पष्ट था—ममता चुनावी हार के बाद पीछे हटने के बजाय संघर्ष की राजनीति को फिर धार देने की कोशिश कर रही हैं। यहीं से बंगाल की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल निकलता है।
क्या बीजेपी की सत्ता में वापसी के बाद ममता बनर्जी का जनाधार पूरी तरह समाप्त हो गया है?
चुनाव के आंकड़े इसका समर्थन नहीं करते कि TMC राजनीतिक रूप से समाप्त हो गई है। 80 विधानसभा सीटें अब भी उसके पास हैं। हालांकि बीजेपी के 207 सीटों के मुकाबले यह संख्या काफी कम है, लेकिन बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी राज्य में 80 सीटों वाला विपक्षी दल खत्म हुआ संगठन नहीं माना जा सकता। ममता की वास्तविक चुनौती अब यह है कि वह इन 80 सीटों को मजबूत विपक्षी आधार में बदल पाती हैं या नहीं।
‘शुभेंदु को लोग जानते ही नहीं’— यह दावा आंकड़ों से साबित नहीं
ममता के समर्थक अक्सर यह तर्क देते हैं कि बीजेपी सत्ता में आने के बावजूद बंगाल में ममता जैसी लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकी। लेकिन विपक्षी नेता शुभेंदु अधिकारी को जनता “जानती ही नहीं”, यह दावा तथ्यात्मक आंकड़ों से सिद्ध नहीं होता।
2026 के चुनाव में बीजेपी ने पूरे राज्य में 207 सीटें जीतीं। यह परिणाम बताता है कि बीजेपी और उसके प्रमुख नेताओं का संगठनात्मक प्रभाव व्यापक है। इसलिए ममता की लोकप्रियता पर राजनीतिक बहस की जा सकती है, लेकिन शुभेंदु अधिकारी की जनस्वीकृति को पूरी तरह नकारना चुनाव परिणामों की अनदेखी होगी।
असल मुकाबला अब यही है कि बीजेपी सत्ता के संगठन को कितनी मजबूती से कायम रखती है और ममता विपक्ष की राजनीति को कितनी तेजी से पुनर्गठित करती हैं।
पांचवां मोर्चा: क्या TMC का कांग्रेस में विलय होगा?
चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा जिन राजनीतिक अटकलों ने पैदा की, उनमें TMC और कांग्रेस के संभावित विलय की चर्चा भी शामिल रही। लेकिन यहां भी खबर और अफवाह के बीच अंतर करना जरूरी है।
जून 2026 में कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से TMC के साथ विलय की खबरों को खारिज किया था। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने ऐसी चर्चाओं को निराधार बताया और कहा कि सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच बातचीत में विलय जैसा कोई मुद्दा नहीं था।
इसलिए फिलहाल TMC-कांग्रेस विलय को “होने वाला है” के रूप में लिखना सही नहीं होगा। इसे अधिकतम राजनीतिक अटकल कहा जा सकता है।
और बंगाल की राजनीति में यह अटकल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस के पास राज्य में केवल दो विधानसभा सीटें हैं, जबकि TMC के पास 80। ऐसे में दोनों दलों के बीच किसी भी प्रकार की औपचारिक राजनीतिक समझ राज्य की विपक्षी राजनीति का स्वरूप बदल सकती है।
SIR बना ममता की राजनीति का नया हथियार
चुनाव के बाद भी SIR यानी Special Intensive Revision का मुद्दा बंगाल की राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। निर्वाचन आयोग ने 2026 के लिए SIR प्रक्रिया और अंतिम मतदाता सूची से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं।
ममता बनर्जी लगातार आरोप लगा रही हैं कि SIR के जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए गए और चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हुई। बीजेपी और चुनावी व्यवस्था से जुड़े पक्ष इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते।
इस विवाद का राजनीतिक असर हालांकि साफ दिखाई देता है। ममता ने चुनावी हार को केवल सीटों की हार के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया के सवाल से जोड़ दिया है। यही रणनीति उन्हें सड़क से अदालत और अदालत से जनता तक राजनीतिक संघर्ष का नया मुद्दा दे रही है।
हार के बाद ममता की असली परीक्षा अब शुरू
मई में आया चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए ऐतिहासिक राजनीतिक उपलब्धि था। 207 सीटों के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ और TMC 80 सीटों पर पहुंच गई। इस लिहाज से यह कहना गलत होगा कि बीजेपी की जीत कमजोर थी। लेकिन दूसरी तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
ममता बनर्जी अभी राजनीतिक मैदान से बाहर नहीं हुई हैं। 20 बागी सांसदों की अयोग्यता की लड़ाई, पार्टी के भीतर टूट को रोकने की कोशिश, बैंक खातों से जुड़े कानूनी संघर्ष, SIR का मुद्दा और सड़कों पर दोबारा सक्रियता—इन सभी मोर्चों ने बंगाल की राजनीति को फिर से संघर्ष की ओर धकेल दिया है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ममता हार गईं या जीत गईं।सवाल यह है कि क्या वह चुनावी हार को राजनीतिक पुनर्निर्माण में बदल सकती हैं? बीजेपी ने सत्ता जीत ली है।
ममता अब यह साबित करने की लड़ाई लड़ रही हैं कि चुनाव जीतने और बंगाल की राजनीति पर स्थायी पकड़ बनाने में फर्क होता है। और आने वाले महीनों में यही फर्क बंगाल की राजनीति की अगली कहानी लिख सकता है।
4 मई का जनादेश बीजेपी के पक्ष में था, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उसके बाद के घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि TMC का संगठन और ममता बनर्जी की राजनीतिक सक्रियता समाप्त नहीं हुई है। 20 सांसदों का मामला अभी प्रक्रिया में है, बैंक खातों पर अदालत की राहत सीमित रही है, तीन विधायकों की औपचारिक घर वापसी का दावा अभी स्वतंत्र पुष्टि मांगता है और कांग्रेस विलय की खबर का कांग्रेस खंडन कर चुकी है।
इसलिए मौजूदा तस्वीर को सबसे सटीक तरीके से यूं कहा जा सकता है—बीजेपी ने चुनाव जीता है, लेकिन बंगाल की राजनीतिक लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

