‘दाने-दाने में केसर का दम’ वाले दावे पर उठे सवाल, फिल्मी सितारों समेत कंपनी से मांगा जवाब
साईडलुक, डेस्क। एक ओर बाजार में असली केसर की कीमत लाखों रुपये प्रति किलो बताई जाती है, वहीं दूसरी ओर मात्र ₹5 में बिकने वाले पान मसाला पैकेट में केसर होने के दावे ने अब कानूनी विवाद का रूप ले लिया है। इसी मुद्दे को लेकर राजस्थान की एक उपभोक्ता अदालत ने पान मसाला निर्माता कंपनी और उसके विज्ञापनों से जुड़े चर्चित फिल्मी चेहरों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
मामला उस विज्ञापन से जुड़ा है जिसमें पान मसाला उत्पाद को “दाने-दाने में केसर का दम” जैसे प्रचार वाक्यों के साथ प्रस्तुत किया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह दावा आम उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाला है, क्योंकि जिस केसर की बाजार कीमत लगभग ₹4 लाख प्रति किलो तक बताई जाती है, उसका वास्तविक उपयोग ₹5 के पैकेट में होना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखाई देता।
उपभोक्ता मंच में पहुंचा मामला
शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में याचिका दाखिल कर कहा कि विज्ञापन के माध्यम से लोगों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि उत्पाद में केसर मौजूद है, जबकि वास्तविकता कुछ और हो सकती है। शिकायत में यह भी कहा गया कि ऐसे प्रचार से उत्पाद की बिक्री बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है और उपभोक्ताओं को गुमराह किया जा रहा है। आयोग ने प्रथम दृष्टया मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी, जहां कंपनी और विज्ञापन से जुड़े पक्षों को अपना पक्ष रखना होगा।
स्वास्थ्य और विज्ञापन दोनों पर बहस तेज
इस विवाद के सामने आने के बाद एक बार फिर तंबाकू और पान मसाला उत्पादों के प्रचार को लेकर बहस तेज हो गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों में आकर्षक दावे और बड़े सितारों की मौजूदगी युवाओं को प्रभावित करती है। वहीं उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी भी उत्पाद के प्रचार में किए गए दावे पूरी तरह सत्य और प्रमाणित होने चाहिए।
करोड़ों के कारोबार पर सवाल
देश में पान मसाला उद्योग हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करता है। ऐसे में विज्ञापनों में इस्तेमाल किए जाने वाले दावों की सत्यता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी उत्पाद में किसी महंगे तत्व के होने का दावा किया जाता है, तो उसके प्रमाण भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने चाहिए, ताकि उपभोक्ता भ्रमित न हों।
कंपनी और कलाकारों की प्रतिक्रिया पर नजर
मामले में नोटिस जारी होने के बाद अब सबकी निगाहें कंपनी और विज्ञापनों से जुड़े कलाकारों की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आयोग संतुष्ट नहीं होता, तो आगे कानूनी कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है। वहीं यदि कंपनी अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज और वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करती है, तो विवाद की दिशा बदल सकती है।
उपभोक्ता अधिकार बनाम विज्ञापन की चमक
यह मामला केवल एक विज्ञापन विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उपभोक्ता अधिकारों, भ्रामक प्रचार और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट की जवाबदेही से भी जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में आयोग की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब इस पूरे मामले की तस्वीर साफ करेंगे।

