साईडलुक, जबलपुर। नर्मदा की कलकल धारा, संगमरमर की चट्टानों का अद्भुत सौंदर्य और संस्कारों से समृद्ध अपनी पहचान रखने वाला जबलपुर शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ एक अलग ही आध्यात्मिक रंग में रंगने लगा है। शहर की सुबह मंदिरों की घंटियों और देवी स्तुति से शुरू होती है तो शाम होते-होते गलियों, बाजारों और देवी पंडालों में रोशनी, सजावट और भक्ति का वातावरण दिखाई देने लगता है। यहां नवरात्र केवल नौ दिनों का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं, पारिवारिक आस्था, सामूहिक उत्सव और सांस्कृतिक एकजुटता का जीवंत अनुभव है।
इस बार जबलपुर के लिए शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है। स्थानीय धार्मिक पंचांग संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, तिथियों का क्षय नहीं होने के कारण इस वर्ष शक्ति आराधना का पर्व दस दिनों तक चलेगा। 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ नवरात्र की शुरुआत हो रही है। 18 अक्टूबर को महाष्टमी और 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इस विशेष तिथि क्रम के कारण भक्तों को देवी आराधना, दुर्गा सप्तशती के पाठ, जवारा स्थापना, कन्या पूजन और पारंपरिक अनुष्ठानों के लिए अतिरिक्त अवसर मिल रहा है।
बड़ी खेरमाई मंदिर: जबलपुर की आस्था का पुराना केंद्र
जबलपुर के प्राचीन देवी मंदिरों का उल्लेख हो और बड़ी खेरमाई मंदिर की चर्चा न हो, ऐसा संभव नहीं है। शहर के श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामुदायिक आस्था का केंद्र भी है। नवरात्र के दिनों में यहां देवी दर्शन, विशेष श्रृंगार, आरती और जवारा से जुड़ी परंपराएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।
मंदिरों में होने वाली पूजा के पीछे केवल धार्मिक विश्वास ही नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक स्मृतियां भी जुड़ी होती हैं। कई परिवार पीढ़ियों से एक ही देवी धाम में पूजा करने आते हैं। किसी के लिए यह मनोकामना का स्थल है, तो किसी के लिए परिवार की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर। नवरात्र के दौरान ऐसे मंदिरों में बुजुर्गों के साथ बच्चों की उपस्थिति इस बात का प्रतीक है कि आस्था का यह सिलसिला नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है।
मार्च 2026 में चैत्र नवरात्र के दौरान प्रकाशित स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी खेरमाई मंदिर में 151 मनोकामना ज्योति कलश और लगभग 1,100 जवारा की व्यवस्था की गई थी। यह आंकड़ा चैत्र नवरात्र से संबंधित है, इसे वर्तमान शारदीय नवरात्र का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी यह मंदिर की धार्मिक गतिविधियों और श्रद्धालुओं की भागीदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
तेवर का त्रिपुर सुंदरी मंदिर: जहां श्रद्धा के साथ जुड़ी है ऐतिहासिक पहचान
जबलपुर शहर से बाहर तेवर क्षेत्र में स्थित मां त्रिपुर सुंदरी राजराजेश्वरी मंदिर जिले के प्रमुख देवी धामों में गिना जाता है। नवरात्र के अवसर पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु देवी के दर्शन के साथ आध्यात्मिक शांति का अनुभव करना चाहते हैं। मंदिर की ख्याति आसपास के क्षेत्रों से आगे तक फैली हुई है और धार्मिक यात्राओं में इसका विशेष स्थान है।
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में मां त्रिपुर सुंदरी को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है। मंदिर से जुड़ी परंपराओं और कथाओं में देवी की महिमा का वर्णन मिलता है। इन मान्यताओं का महत्व श्रद्धालुओं की आस्था में है, जबकि मंदिर के इतिहास और प्राचीनता से जुड़े विशिष्ट दावों के लिए ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक प्रमाणों का सहारा लेना आवश्यक है।
नवरात्र के दौरान देवी धामों की यात्रा का एक अलग ही महत्व दिखाई देता है। परिवार साथ निकलते हैं, पूजा की सामग्री खरीदी जाती है और दर्शन के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है। यह धार्मिक यात्रा स्थानीय दुकानदारों, फूल विक्रेताओं, प्रसाद विक्रेताओं और छोटे कारोबारियों के लिए भी गतिविधियों का अवसर बनती है। हालांकि, नवरात्र के दौरान मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सटीक संख्या का आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
मां बगलामुखी सिद्धपीठ और साधना की परंपरा
जबलपुर के देवी उपासना स्थलों में मां बगलामुखी सिद्धपीठ का भी उल्लेख किया जाता है। मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में एक माना जाता है। तांत्रिक और शाक्त परंपराओं में उनकी आराधना का विशिष्ट स्थान है। नवरात्र के दौरान देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने वाले श्रद्धालु शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता की कामना करते हैं।
भारतीय धार्मिक परंपरा में देवी के नौ स्वरूपों की उपासना का अर्थ केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक प्रत्येक स्वरूप को जीवन के किसी न किसी गुण, संकल्प या आध्यात्मिक भाव से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि नवरात्र में मंदिरों के साथ घरों में भी दुर्गा सप्तशती का पाठ, दीप प्रज्ज्वलन, व्रत और कन्या पूजन किया जाता है।
छोटी खेरमाई, बूढ़ी खेरमाई और मोहल्लों की देवी परंपरा
जबलपुर की नवरात्र संस्कृति की एक विशेषता यह भी है कि यहां धार्मिक उत्सव केवल बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों तक सीमित नहीं रहता। छोटी खेरमाई, बूढ़ी खेरमाई और विभिन्न मोहल्लों में स्थापित देवी मंदिर स्थानीय समुदायों के धार्मिक जीवन का हिस्सा हैं। इन मंदिरों में होने वाली आरती, सामूहिक पूजा और पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से मोहल्ले के लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
कई स्थानों पर स्थानीय समितियां देवी पंडालों की सजावट, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियों में जुटती हैं। कहीं पारंपरिक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं तो कहीं आधुनिक रोशनी और कलात्मक सजावट के माध्यम से देवी दरबार को आकर्षक रूप दिया जाता है। घमापुर सहित शहर के अनेक इलाकों में मूर्तिकार नवरात्र से पहले प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कारीगरों, चित्रकारों, सजावट करने वालों और छोटे व्यापारियों की मेहनत भी शामिल रहती है।
नवरात्र केवल पूजा नहीं, स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी उत्सव
नवरात्र के दौरान फूल, नारियल, चुनरी, पूजा सामग्री, फल, मिठाई और प्रसाद की मांग बढ़ती है। देवी पंडालों की सजावट, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि उपकरण, प्रतिमा निर्माण और परिवहन से जुड़े कामों में भी स्थानीय स्तर पर गतिविधियां बढ़ती हैं। गरबा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने वाले समूहों को भी व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ती है।
इस तरह नवरात्र धार्मिक आयोजन होने के साथ शहर की छोटी अर्थव्यवस्था को गति देने वाला अवसर भी बनता है। हालांकि, जबलपुर में इस वर्ष नवरात्र से होने वाले कुल कारोबार, रोजगार या श्रद्धालुओं के खर्च का कोई सत्यापित समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए आर्थिक गतिविधियों का महत्व समझना जरूरी है, लेकिन बिना प्रमाण के किसी निश्चित राशि या रोजगार संख्या का दावा करना उचित नहीं होगा।
दस दिनों की आराधना और इस बार की खास तिथियां
इस वर्ष शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ हो रही है। स्थानीय पंचांग संबंधी प्रकाशित जानकारी के अनुसार, 18 अक्टूबर को महाष्टमी रहेगी और 19 अक्टूबर की सुबह 7 बजकर 53 मिनट तक अष्टमी तिथि की व्याप्ति बताई गई है। 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। व्रत, हवन और कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय मंदिर के पुजारी अथवा मान्य पंचांग से पूजा का समय सुनिश्चित करना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग परंपराओं और स्थानीय धार्मिक गणनाओं के अनुसार अनुष्ठान का समय अलग हो सकता है।
नवरात्र में देवी के नौ रूपों की पूजा के साथ जवारा बोने, अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित करने और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई परिवार पूरे नौ दिनों तक उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग प्रथम और अंतिम दिन व्रत करते हैं। अष्टमी और नवमी के अवसर पर कन्या पूजन तथा भंडारे आयोजित किए जाते हैं। इन धार्मिक अनुष्ठानों में व्यक्तिगत श्रद्धा के साथ सामुदायिक सहभागिता भी महत्वपूर्ण रहती है।
उत्सव के बीच सुरक्षा और स्वच्छता की जिम्मेदारी
बड़े धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। जबलपुर पुलिस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 7 अक्टूबर को कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने दुर्गा उत्सव समितियों के आयोजकों के साथ बैठक कर पंडालों की सुरक्षा, विद्युत वायरिंग, यातायात, जुलूस के निर्धारित मार्ग, ध्वनि सीमा और प्रतिमा विसर्जन से संबंधित निर्देश दिए। प्रशासन ने समितियों से नियमों का पालन करने और शांति तथा सौहार्द बनाए रखने में सहयोग करने की अपील की है।
पंडालों में सुरक्षित विद्युत कनेक्शन, अग्नि सुरक्षा के उपाय, आने-जाने के रास्ते खुले रखना और भीड़ के दबाव से बचने की व्यवस्था जरूरी है। विसर्जन के दौरान निर्धारित मार्ग और समय का पालन करना तथा जलाशयों के पास सावधानी बरतना भी महत्वपूर्ण है। आयोजकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ आसपास रहने वाले लोगों, दुकानदारों और राहगीरों को भी अनावश्यक परेशानी न हो।
नवरात्र की वास्तविक सुंदरता तभी बनी रहती है, जब आस्था के साथ अनुशासन भी हो। तेज ध्वनि, यातायात अवरोध, असुरक्षित बिजली व्यवस्था या अफवाहों से बचना आयोजकों और नागरिकों, दोनों की जिम्मेदारी है।
संस्कारधानी की पहचान में नवरात्र का विशेष स्थान
जबलपुर को संस्कारधानी कहने के पीछे केवल उसका धार्मिक महत्व नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक परंपराएं, सामाजिक जीवन और विभिन्न समुदायों की सहभागिता भी है। नवरात्र इन सभी पहलुओं को एक साथ सामने लाता है। मंदिरों में पूजा करने वाले श्रद्धालु, देवी प्रतिमाएं बनाने वाले कारीगर, पंडाल सजाने वाले युवा, प्रसाद तैयार करने वाले दुकानदार और व्यवस्थाओं में जुटे स्वयंसेवक—सभी इस उत्सव के अलग-अलग हिस्से हैं।
नवरात्र की रातें भक्ति गीतों, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जीवंत होती हैं, जबकि सुबह मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के साथ शहर की धार्मिक दिनचर्या शुरू हो जाती है। इस दौरान लोगों की व्यक्तिगत मनोकामनाएं भी जुड़ी होती हैं और सामूहिक रूप से सुख, शांति, स्वास्थ्य तथा समृद्धि की कामना भी की जाती है।
देवी आराधना का व्यापक संदेश शक्ति के साथ करुणा, साहस के साथ संयम और आस्था के साथ जिम्मेदारी को जोड़ता है। यही संदेश नवरात्र को केवल धार्मिक कैलेंडर की एक अवधि नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों को याद करने का अवसर बनाता है।
संस्कारधानी जबलपुर में नवरात्र का उत्सव मंदिरों की घंटियों से शुरू होकर लोगों के घरों, बाजारों और सामूहिक जीवन तक पहुंचता है। दस दिनों की इस शक्ति आराधना में शहर अपनी धार्मिक विरासत को फिर से जीता है। देवी के जयकारों के बीच यही कामना सबसे महत्वपूर्ण है कि उत्सव श्रद्धा, सुरक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सौहार्द के साथ संपन्न हो तथा संस्कारधानी की पहचान और अधिक मजबूत बने।

