धर्मनगरी का सरकारी अस्पताल बना निजी अस्पतालों के एजेंटों की चरागाह,
मरीजों को डराकर लूटने का नेटवर्क उजागर
साईडलुक, (रामकुमार रजक) मैहर। माँ शारदा की इस पवित्र नगरी में एक ऐसा घिनौना खेल खेला जा रहा है जो न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की जड़ें खोखली कर रहा है, बल्कि गरीब और बेबस मरीजों की तकलीफों को भी मुनाफे का जरिया बना रहा है। मैहर का सिविल अस्पताल, जो सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये की सुविधाओं से लैस है, आज उपचार के बजाय दलालों के गढ़ के रूप में बदनाम हो रहा है। अस्पताल परिसर में सक्रिय एक संगठित गिरोह मरीजों को भय दिखाकर नागपुर के महंगे निजी सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में भेज रहा है और इस ‘रेफर खेल’ में हर बार मोटा कमीशन कमाया जा रहा है।
अस्पताल में पहुंचे मरीजों के परिजनों ने जो आपबीती सुनाई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। बताया जा रहा है कि जैसे ही कोई गंभीर मरीज अस्पताल की दहलीज पर कदम रखता है, वहाँ पहले से घात लगाए बैठे कुछ संदिग्ध चेहरे सक्रिय हो जाते हैं। ये लोग पेशेवर अंदाज में परिजनों के पास पहुंचते हैं और मरीज की स्थिति को जरूरत से कहीं अधिक गंभीर बताकर उनके मन में दहशत भर देते हैं। “यहाँ इलाज नहीं हो पाएगा,” “मरीज की जान खतरे में है,” “सरकारी अस्पताल में ये सुविधा नहीं है” जैसे वाक्य इन दलालों की जुबान पर हमेशा तैयार रहते हैं। एक बार जब परिवार भावनात्मक और मानसिक दबाव में आ जाता है, तो इन्हें नागपुर के किसी महंगे निजी अस्पताल का नाम थमा दिया जाता है और वे अपनों की जान बचाने की उम्मीद लेकर उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जहाँ उनकी जेब का एक-एक पैसा निचोड़ लिया जाता है।
गरीबी और बेबसी, सबसे आसान शिकार
इस पूरे गोरखधंधे का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसके शिकार ज्यादातर वे लोग हैं जिनके पास न ताकत है, न पैसा और न ही जागरूकता। दूर-दराज के गांवों से आए मजदूर, किसान और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार इन दलालों की चालाकी को समझ नहीं पाते। अपने बीमार स्वजन को बचाने की ललक में वे कर्ज लेकर, जमीन गिरवी रखकर या घर का आखिरी सोना बेचकर नागपुर की राह पकड़ लेते हैं। सूत्रों के अनुसार प्रत्येक मरीज को इन निजी अस्पतालों में पहुंचाने के बदले दलालों को हजारों रुपये तक का कमीशन मिलता है। यह सिलसिला महीनों से, बल्कि संभवतः सालों से बेरोकटोक जारी है।
‘नागपुर कनेक्शन’ क्या यह महज बाहरी खेल है?
सबसे बड़ा और सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या यह केवल कुछ बाहरी लोगों का काम है? सूत्र बताते हैं कि इस नेटवर्क के तार अस्पताल के भीतर तक फैले हो सकते हैं। जब अस्पताल परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे हों, सुरक्षाकर्मी तैनात हों, फिर भी ये संदिग्ध लोग बेखौफ होकर वार्डों तक पहुँच जाएं तो यह सवाल लाजिमी है कि इन्हें किसका संरक्षण प्राप्त है। क्या कोई सफेदपोश इस पूरे सिंडिकेट को भीतर से ऑक्सीजन दे रहा है? यह वह सवाल है जिसका जवाब केवल एक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही दे सकती है।
जनता का फूटा गुस्सा, प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग
मामले के सामने आते ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों में तीव्र आक्रोश की लहर दौड़ गई है। लोगों की मांग है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तत्काल हस्तक्षेप करें। अस्पताल परिसर में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर कड़ी निगरानी लगाई जाए, संदिग्ध दलालों की पहचान कर उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की जाए और मरीजों को सटीक जानकारी देने के लिए सरकारी हेल्प डेस्क को और अधिक सशक्त बनाया जाए। इसके साथ ही यह भी मांग उठ रही है कि इस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने के लिए उच्चस्तरीय जांच बैठाई जाए ताकि दोषियों को कड़ी सजा मिल सके।
अब फैसले की घड़ी, प्रशासन की परीक्षा
सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इसलिए बनाई जाती हैं ताकि हर नागरिक को, चाहे वह गरीब हो या अमीर, बेहतर इलाज मिल सके। जब उन्हीं सेवाओं का उपयोग कुछ स्वार्थी तत्व लूट के हथियार के रूप में करने लगें, तो यह पूरी व्यवस्था पर एक काला धब्बा है। यदि मैहर सिविल अस्पताल में पनप रहे इस दलाल तंत्र पर समय रहते लगाम नहीं कसी गई, तो आम आदमी का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से भरोसा सदा के लिए उठ जाएगा। अब सारी नजरें जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर टिकी हैं, क्या वे इस ‘नागपुर सिंडिकेट’ को तोड़ने का साहस दिखाएंगे?

