शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक राहत के मोर्चे पर सवाल कायम,
टैक्स में छूट जैसी मांगों पर अब भी चुप्पी…
साईडलुक, (सत्यजीत यादव)। देश में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान एक समय उम्मीद की बड़ी किरण बनकर उभरा था। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और बेटियों को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने के इस नारे ने समाज में व्यापक चर्चा पैदा की। लेकिन वर्षों बाद अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह अभियान केवल जागरूकता तक सीमित रह गया है या वास्तव में बेटियों के जीवन में ठोस बदलाव ला पाया है।
सरकारी दावों के अनुसार कई राज्यों में लिंगानुपात में सुधार हुआ है और बेटियों के स्कूल में दाखिले की संख्या भी बढ़ी है। समाज में धीरे-धीरे सोच बदलती नजर आ रही है और कई परिवार अब बेटियों की पढ़ाई को प्राथमिकता देने लगे हैं। पंचायत और स्थानीय स्तर पर भी इस अभियान को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए हैं, जिससे सकारात्मक संकेत मिले हैं।
हालांकि जमीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े करती है। शिक्षा के क्षेत्र में अब भी कई बाधाएं मौजूद हैं—ग्रामीण इलाकों में स्कूलों की कमी, सुरक्षा की चिंता, संसाधनों का अभाव और आर्थिक दबाव के चलते बेटियों की पढ़ाई बीच में छूट जाना आम समस्या बनी हुई है। यही नहीं, योजना के बजट का बड़ा हिस्सा प्रचार-प्रसार में खर्च होने की आलोचना भी लगातार होती रही है।
इसी बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सरकार बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है, तो क्या उसे शिक्षा पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाने चाहिए? विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि बेटियों की शिक्षा पर टैक्स या शुल्क में विशेष छूट दी जानी चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिल सके। वर्तमान में शिक्षा से जुड़े कई खर्च—जैसे निजी स्कूलों की फीस, किताबें, कोचिंग और अन्य संसाधन—पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर का प्रभाव पड़ता है, जो गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बोझ बनता है।
हालांकि सरकार की ओर से छात्रवृत्ति, साइकिल योजना, मुफ्त पाठ्यपुस्तक जैसी कई पहलें चलाई जा रही हैं, लेकिन टैक्स में सीधी राहत या व्यापक आर्थिक छूट को लेकर अब तक कोई बड़ा और ठोस कदम सामने नहीं आया है। यही वजह है कि “बेटी पढ़ाओ” का नारा कई परिवारों के लिए आर्थिक चुनौतियों से टकराता नजर आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वास्तव में इस अभियान को सफल बनाना है, तो केवल जागरूकता नहीं बल्कि आर्थिक स्तर पर भी मजबूत समर्थन जरूरी है। जब तक शिक्षा सस्ती और सुलभ नहीं होगी, तब तक बेटियों को बराबरी का अवसर मिलना मुश्किल रहेगा।
आज जरूरत इस बात की है कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” को केवल एक नारे से आगे बढ़ाकर एक समग्र नीति बनाया जाए, जिसमें शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक राहत तीनों पहलुओं पर बराबर ध्यान दिया जाए। तभी यह पहल कागजों से निकलकर समाज की सच्चाई बन पाएगी।

