साईडलुक, जबलपुर। भेड़ाघाट ब्लॉक के छोटे से गांव दिघौरा से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो ग्रामीण भारत की हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है। आशा देवी, जिन्होंने कभी उधार लेकर घर चलाया, आज गांव में ‘ट्रैक्टर वाली दीदी’ और सफल महिला उद्यमी के नाम से जानी जाती हैं।
आशा देवी का जीवन पहले मुश्किलों से भरा था। पति के साथ न रहने के कारण वह मायके में रहकर बच्चों का पालन-पोषण कर रही थीं। सीमित आय में बच्चों की पढ़ाई, दवाई और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना नामुमकिन सा था। कई बार हालात इतने बिगड़े कि उधार लेकर घर चलाना पड़ा।
टर्निंग पॉइंट: जीवन में बदलाव की शुरुआत तब हुई जब आशा देवी की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में नियुक्ति हुई। यहीं से उन्हें स्व-सहायता समूह की जानकारी मिली। उन्होंने अपनी माता के साथ समूह से जुड़कर बचत, वित्तीय प्रबंधन और स्वरोजगार के गुर सीखे।
1 लाख के लोन से खरीदा सपनों का ट्रैक्टर…
समूह से मिले प्रशिक्षण के बाद आशा देवी ने छोटे ऋण लेकर गाय-भैंस पालन और खेती शुरू की। धीरे-धीरे आय बढ़ी। फिर स्व-सहायता समूह से 1 लाख रुपए का ऋण मिला। इस रकम से उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया, ट्रैक्टर खरीद लिया। इसके बाद उन्होंने गांव में जुताई-बुवाई के लिए ट्रैक्टर से सेवाएं देनी शुरू कीं। यही कदम उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। ट्रैक्टर के साथ खेती और पशुपालन से भी आमदनी बढ़ती गई।
आमदनी का गणित: 10 हजार से 25 हजार तक का सफर…
आर्थिक सशक्तिकरण के साथ आशा देवी का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। अब वे सम्मानपूर्वक परिवार चला रही हैं और गांव में मिसाल बन चुकी हैं।
गांव की दूसरी महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा…
आशा देवी की सफलता को देखकर दिघौरा की कई महिलाएं अब स्व-सहायता समूह से जुड़ रही हैं। खेती, पशुपालन और छोटे व्यवसाय की तरफ उनका रुझान बढ़ा है। आशा देवी साबित करती हैं कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और एक अवसर मिलने पर कोई भी अपनी तकदीर बदल सकता है।
आशा देवी कहती हैं: “समूह से जुड़ने के बाद समझ आया कि बचत छोटी हो पर नियमित हो तो बड़े सपने पूरे हो सकते हैं। ट्रैक्टर सिर्फ मशीन नहीं, मेरे बच्चों का भविष्य है।”

