आर्थिक सर्वे 2025-26 में खुलासा—डिजिटल लत के बीच भी खबरों के लिए सोशल मीडिया पर भरोसा बढ़ा, 47% आबादी अब भी इंटरनेट से दूर; टीवी रेटिंग नीति 2026 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जवाबदेही पर कसी लगाम
साईडलुक, सत्यजीत यादव। देश में खबरों के उपभोग का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टीवी न्यूज चैनलों से आम दर्शकों का मोहभंग साफ दिखने लगा है, जबकि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोगों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में पेश आंकड़े और हालिया सरकारी नीतिगत बदलाव इस बदलाव की तस्दीक कर रहे हैं।
संसद में 29 जनवरी 2026 को पेश आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार डिजिटल लत को केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक संकट करार दिया गया है। सर्वे ने चेताया है कि मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब लोगों की सेहत, पढ़ाई के नतीजों और भविष्य की उत्पादकता पर असर डाल रहा है। इसके बावजूद खबरों और सूचनाओं के लिए युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक का झुकाव सोशल मीडिया की ओर बढ़ा है।
दर्शकों के घटते भरोसे की ओर इशारा
दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल गहराते जा रहे हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 16 जनवरी 2014 की टीवी रेटिंग दिशा-निर्देशों को बदलकर टीवी रेटिंग नीति 2026 लागू कर दी है। नई नीति में एजेंसियों को हर तीन महीने में आंतरिक ऑडिट और हर वर्ष स्वतंत्र बाहरी ऑडिट कराना अनिवार्य किया गया है। लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्यूअरशिप को अब मापन में नहीं गिना जाएगा और शिकायत निपटारे के लिए 10 दिनों की समयसीमा तय की गई है। नियम तोड़ने पर रेटिंग निलंबन से लेकर पंजीकरण रद्द करने तक के प्रावधान रखे गए हैं। ये सख्ती दर्शकों के घटते भरोसे की ओर इशारा करती है।
खबरों के लिए सोशल मीडिया पर निर्भरता
भरोसे का यह स्थानांतरण आंकड़ों में भी दिखता है। इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2025 में जीएसएमए द्वारा पेश रिपोर्ट के अनुसार देश की 47% आबादी अब भी इंटरनेट से वंचित है। फिर भी जिन 53% लोगों तक इंटरनेट पहुंचा है, उनमें खबरों के लिए यूट्यूब, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पहली पसंद बनते जा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारत में पुरुषों के मुकाबले 33% कम महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं, लेकिन डिजिटल पहुंच रखने वाली महिलाओं में भी खबरों के लिए सोशल मीडिया पर निर्भरता बढ़ी है।
मिलती है सीधे सवाल पूछने की आजादी
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर एकतरफा नैरेटिव, लैंडिंग पेज के जरिए कृत्रिम टीआरपी और भड़काऊ बहसों ने दर्शकों को दूर किया है। वहीं सोशल मीडिया पर यूजर को अपनी पसंद की खबर चुनने, तथ्यों को क्रॉस-चेक करने और सीधे सवाल पूछने की आजादी मिलती है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्विटर हैंडल पर स्थायी प्रतिबंध के बाद यह बहस भी तेज हुई कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब महज सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि सूचना प्रवाह के निर्णायक बन चुके हैं। भारत में भी सरकारें और संस्थान इन प्लेटफॉर्मों का जिस तरह इस्तेमाल कर रही हैं, उससे शक्ति संतुलन बदलने के संकेत मिले हैं।
बच्चों में डिजिटल लत पर गंभीर चिंता
हालांकि सोशल मीडिया की बढ़ती स्वीकार्यता के साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। आर्थिक सर्वेक्षण ने बच्चों में डिजिटल लत पर गंभीर चिंता जताते हुए सोशल मीडिया के लिए उम्र-आधारित सीमा तय करने की सिफारिश की है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि कम उम्र के यूजर्स हानिकारक कंटेंट के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, इसलिए प्लेटफॉर्म्स पर एज वेरिफिकेशन और सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगा चुका है, जबकि फ्रांस, ब्रिटेन और डेनमार्क इस दिशा में विचार कर रहे हैं।
टीआरपी-केंद्रित पत्रकारिता से ऊबा दर्शक
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीआरपी-केंद्रित पत्रकारिता से ऊबा दर्शक अब सोशल मीडिया की सहभागी पत्रकारिता की ओर बढ़ रहा है। भले ही 47% आबादी अब तक डिजिटल दायरे से बाहर है, लेकिन जो लोग जुड़े हैं उनके लिए मोबाइल की छोटी स्क्रीन ही सबसे बड़ा न्यूजरूम बन गई है। सरकार की नई टीवी रेटिंग नीति और डिजिटल लत पर अंकुश की कवायद इस बदलते मीडिया परिदृश्य को और संतुलित करने की कोशिश है।

