इंदौर श्रम आयुक्त कार्यालय ने अधिनिर्णय के लिए सौंपा मामला, औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 10 के तहत हुई कार्रवाई
साईडलुक, जबलपुर। देश की दिग्गज दवा कंपनी सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसके पूर्व कर्मचारी के बीच चल रहा सेवा विवाद अब जबलपुर श्रम न्यायालय में पहुंच गया है। मध्य प्रदेश श्रम आयुक्त कार्यालय इंदौर ने इस औद्योगिक विवाद को अधिनिर्णय के लिए जबलपुर श्रम न्यायालय को अंतरित कर दिया है। यह आदेश उप श्रमायुक्त इंदौर द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 10 की उपधारा 1 में प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए जारी किया गया है।
यह पूरा मामला रीवा निवासी पूर्व कर्मचारी दीपांशु पाठक पिता राजेन्द्र कुमार पाठक और सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड मुंबई के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं फील्ड एचआर विभाग के बीच का है। प्राप्त जानकारी के अनुसार दीपांशु पाठक कंपनी में लंबे समय तक सेवाएं दे चुके हैं और कंपनी प्रबंधन द्वारा उन्हें सेवापृथक कर दिया गया था। प्रबंधन के इस फैसले को कर्मचारी ने अनुचित और नियम विरुद्ध बताते हुए श्रम विभाग में चुनौती दी थी।
क्या है पूरा विवाद
कर्मचारी का आरोप है कि उसे बिना पर्याप्त कारण और बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए नौकरी से अलग कर दिया गया। इस संबंध में उन्होंने पहले विभागीय स्तर पर अपना पक्ष रखा और बाद में श्रम आयुक्त कार्यालय में औद्योगिक विवाद के रूप में शिकायत दर्ज कराई। प्रारंभिक सुनवाई और सुलह प्रक्रिया के बाद जब दोनों पक्षों के बीच समझौता नहीं हो सका तो नियमानुसार मामले को अधिनिर्णय के लिए श्रम न्यायालय भेजना आवश्यक हो गया।
श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि श्रम न्यायालय जबलपुर अब इस बात का परीक्षण करेगा कि आवेदक दीपांशु पाठक को सेवापृथक किया जाना वैध और उचित था या नहीं। यदि न्यायालय यह पाता है कि सेवापृथक्कीकरण अनुचित है तो ऐसी स्थिति में आवेदक किस प्रकार की सहायता या राहत पाने का हकदार होगा और नियोक्ता कंपनी को इस संबंध में क्या निर्देश दिए जाने चाहिए, इस पर श्रम न्यायालय ही अंतिम निर्णय लेगा।
श्रम न्यायालय में होगी विस्तृत सुनवाई
अब जबलपुर श्रम न्यायालय में दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा। कर्मचारी पक्ष को अपने सेवाकाल, सेवा शर्तों और सेवापृथक्कीकरण को अनुचित बताने के लिए दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। वहीं कंपनी प्रबंधन को अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए कारण और वैधानिक प्रक्रिया का ब्यौरा देना होगा। न्यायालय सभी तथ्यों, गवाहों और दस्तावेजों की जांच के बाद अधिनिर्णय पारित करेगा।
उल्लेखनीय है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत जब प्रबंधन और कर्मचारी के बीच का विवाद सुलह वार्ता से नहीं सुलझता है तो उसे श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण को सौंपा जाता है ताकि न्यायसंगत फैसला हो सके। इस मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई है। इस फैसले के बाद अब निगाहें जबलपुर श्रम न्यायालय की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।

