10 साल के पट्टे पर मिला 67 हेक्टेयर का जलाशय, रोज 1200 रुपये तक की आय से मजबूत हो रहा परिवार
साईडलुक, जबलपुर। जबलपुर नगर निगम क्षेत्र में स्थित फूटाताल जलाशय आज 150 मछुआ परिवारों के लिए केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा सहारा बन गया है। सहकारिता की भावना और शासकीय योजनाओं के संगम से मछुआ मजदूर सहकारी समिति फूटाताल ने रोजगार का एक ऐसा मॉडल खड़ा किया है जो पूरे जिले के लिए प्रेरणा बन रहा है।
मछुआ मजदूर सहकारी समिति फूटाताल का पंजीयन 11 मई 1988 को हुआ था और पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से यह समिति मछुआ परिवारों को संगठित कर रोजगार उपलब्ध करा रही है। समिति के अध्यक्ष ओम हरि कश्यप के नेतृत्व में समिति ने सामूहिक मत्स्य पालन को एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप दिया है। समिति को 67 हेक्टेयर जलक्षेत्र वाला फूटाताल जलाशय वर्ष 2018 से 2028 तक दस वर्षीय पट्टे पर आवंटित किया गया है, जिससे सदस्यों को दीर्घकालिक योजना के साथ मत्स्य पालन करने का अवसर मिला है।
समिति द्वारा जलाशय में समय-समय पर मत्स्य बीज का संचयन किया जाता है, जिससे मछली उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है। समिति के सदस्य सप्ताह में तीन से पांच दिन मछली पकड़ने का कार्य करते हैं और इससे प्रत्येक सदस्य को प्रतिदिन लगभग एक हजार से बारह सौ रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। इस नियमित आय से परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, बच्चों की परवरिश और दैनिक जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं।
मत्स्य विभाग के सहयोग से समिति के सभी सदस्यों का राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पंजीयन कराया गया है, जिससे उन्हें शासकीय योजनाओं से सीधे जोड़ा गया है। सदस्यों को किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा मिल रही है, जिससे वे जाल और अन्य आवश्यक सामग्री खरीदने में सक्षम हुए हैं। इसके साथ ही सभी 150 सदस्यों का दुर्घटना बीमा भी कराया गया है, ताकि जोखिम भरे इस कार्य के दौरान उन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
समिति की मानवीय पहल भी काबिले तारीफ है। यदि किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हो जाती है तो समिति की ओर से उसके परिवार को पांच हजार रुपये की तात्कालिक सहयोग राशि प्रदान की जाती है। यह छोटी सी मदद परिवार के प्रति संवेदनशीलता और सामूहिक जिम्मेदारी की बड़ी मिसाल पेश करती है। फूटाताल मछुआ मजदूर सहकारी समिति की यह सफलता साबित करती है कि यदि संगठित प्रयास और शासकीय सहयोग मिल जाए तो मछुआ समुदाय भी आत्मनिर्भर बनकर अपनी जिंदगी संवार सकता है।

