डिंडौरी, राठौर रामसहाय मर्दन। जनपद पंचायत डिंडौरी अंतर्गत ग्राम पंचायत कनाईसांगवा में 5वीं और 15वीं वित्त आयोग की राशि में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। लेकिन हैरानी वाली बात यह है कि जांच टीम को यह गड़बड़ियां “दिखाई” ही नहीं दीं।
फर्जी भुगतान का खुलासा लेकिन जांच में लीपापोती…
साईड लुक न्यूज द्वारा खबर प्रकाशित होने के बाद प्रभारी सीईओ प्रमोद ओझा ने दो सदस्यीय जांच टीम गठित की थी, जिसमें खंड पंचायत अधिकारी ताराचंद लोमेश और सहायक लेखा अधिकारी नरेंद्र कुमार करचम शामिल थे। जांच के दौरान कई ऐसे भुगतान सामने आए जो नियमों के विरुद्ध थे, लेकिन रिपोर्ट में इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया।
सफाई कर्मी को दो माह में 36 हजार का भुगतान…?
रिपोर्ट में 09.03.2025 को सफाई कर्मी को ₹24,000 और 16.05.2025 को ₹12,000 का भुगतान का भुगतान 15 वें वित्त किया गया है, यानी दो महीने में ₹36,000। जबकि नियम अनुसार एक सफाई कर्मी का मानदेय ₹4000 से ₹5000 तक होता है। यह सरासर अनियमितता है, 15 वें वित्त की राशि का मानदेय में करना गाइडलाइन के विपरीत है,लेकिन जांच दल ने इसे नजरअंदाज कर दिया।
जबकि 15 वें वित्त योजना में प्रावधान है कि सरपंच, सचिव को एक वर्ष पूर्व आगामी वर्ष के लिए ग्राम विकास के लिए कार्य योजना तैयार कर ग्रामसभा में अनुमोदन कराकर ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम में चयनित कार्य को 60 -40 के रेसियो में कराना होता है। इसके तहत स्वच्छता में 30, शिक्षा में 30, अधो संरचना में 40 प्रतिशत प्लान के तहत केंद्रीय सहायता राशि 15वें वित्त से ग्राम पंचायत का विकास करना होता है, लेकिन जीपीडीपी कुछ और बनाते हैं और खर्च कुछ और कर रहे है। वही इन्हीं को जांच टीम के द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया है जबकि यहीं मुख्य बिंदु होनी थी।
26 जनवरी के नाम पर फर्जी भुगतान….
26 जनवरी के कार्यक्रम के नाम पर ‘अज्जू किराना’ को बिना जीएसटी के ₹9250 और ‘सुमित होटल एंड भोजनालय’ को ₹14,000 का भुगतान किया गया, जबकि वास्तविक कार्यक्रम स्थल और व्यय संदिग्ध हैं। यही नहीं, धुंधले और अमान्य फोटो के आधार पर फोटो कॉपी और स्टेशनरी के मद में हजारों का भुगतान हुआ।
नदी सफाई और नल जल योजना में दोहरी हेराफेरी…
नदी सफाई के नाम पर ₹26,000 का भुगतान दर्शाया गया है, जबकि यह कार्य नरेगा मजदूरों द्वारा किया गया। इसके बावजूद 15वीं वित्त की राशि से आहरण किया गया। नल जल योजना, पाइपलाइन मरम्मत, और स्टॉप डैम रिपेयर जैसे कार्यों में भी ऐसे ही फर्जीवाड़े का खेल हुआ।
प्रमुख तथ्य जिन पर नहीं गई जांच टीम की नजर…
कई कार्यों में अधिक भुगतान (निर्माण कार्य में ₹7000 तक अधिक)।
मजदूरी के नाम पर पंच पति के खाता में (₹31,500) दोहरा भुगतान।
फर्जी कंप्यूटर, स्टेशनरी और निर्माण सामग्री की खरीद।
फोटो प्रूफ की गुणवत्ता संदिग्ध और मान्यता रहित।
एक ही काम में दोहरी राशि आहरण।
जांच टीम ने अनियमितताओं को स्पष्ट रूप से नज़रअंदाज़ किया है या कहें तो सरपंच—सचिव के पक्ष में रिपोर्ट को मोड़ा है। रिपोर्ट में सिर्फ सतही टिप्पणियाँ की गईं, जबकि साक्ष्यों के अनुसार लाखों की हेराफेरी स्पष्ट रूप से सामने है। पारदर्शिता पोर्टल, भुगतान रजिस्टर और फर्जी बिलों की तस्दीक की बजाय सिर्फ भुगतान की पुष्टि कर जांच पूरी कर दी गई। अब सवाल यह उठता है कि— क्या जनपद पंचायत इस तरह की ‘अंधी जांच’ पर कोई सख्त कार्रवाई करेगा? क्या सरपंच-सचिव की मिलीभगत से पंचायतों में जनता की गाढ़ी कमाई ऐसे ही लुटती रहेगी?



