मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर 2009 के पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त रखने और आरटीई अधिनियम में संशोधन की मांग की। तर्क यह दिया गया कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों पर यह व्यवस्था थोपना उनके आत्मसम्मान और अनुभव का अपमान है।
साईडलुक, जबलपुर। मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ ‘अजाक्स’ ने टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ चल रहे शिक्षक आंदोलन को खुला समर्थन दिया है। संगठन ने कहा कि 2009 से पहले नियुक्त शिक्षकों, जिन्होंने उस समय लागू नियमों के अनुसार नियुक्ति पाई थी, उन पर बाद की पात्रता शर्तें लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
संघ के जिला अध्यक्ष योगेश चौधरी ने जारी बयान में कहा कि जो शिक्षक 25 से 30 साल या उससे अधिक समय से बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, उनसे अब दो साल के भीतर टीईटी पास करने की अपेक्षा करना उनकी सेवाओं और सम्मान के खिलाफ है। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि असफल रहने पर सेवा समाप्ति जैसी आशंका शिक्षकों में गहरी नाराजगी और भय पैदा कर रही है।
अजाक्स ने इसे शिक्षकों के आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि शिक्षक समाज की कई पीढ़ियों को गढ़ने का काम कर चुके हैं, इसलिए उनके साथ किसी तरह का अपमानजनक व्यवहार नहीं होना चाहिए। संगठन ने सरकार से मांग की कि वह सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों का पक्ष रखे और संसद तथा विधानसभा में आवश्यक संशोधन विधेयक लाकर 2009 के पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की बाध्यता से राहत दिलाए।
जिला स्तर पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते समय संगठन के कई पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। इनमें अजय सोनकर, राजेन्द्र टेकाम, धर्मेन्द्र कुकरेले, दालचंद पासी, शिवकुमार पटारिया, किशोरी लाल मरकाम, मुकेश मेहरा, तुलसी टेकाम, के.के. गोटिया, राममिलन बरकड़े, विजय दाहिया, घनश्याम अहिरवार, नन्हे लाल प्रधान, नरेंद्र उईके, पंकज कटारिया, संतोष मेहरा, खुशील डोंगरे, राजकुमार जाटव, दिनेश सोरदे, राजेश जैन, सुरेंद्र पोर्ते, शेख शकील, हरिराजपूत, मंजू चढार, अनीता सिंह, ममता घनघोरिया और राजकुमारी खटीक सहित अन्य कार्यकर्ता शामिल थे।
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