सुरक्षा बनाम नागरिक सुविधा पर अदालत की तीखी टिप्पणी, दिल्ली पुलिस और DMRC से मांगा विस्तृत जवाब
साईडलुक, डेस्क। राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान एक साथ कई मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके नाम पर लाखों दैनिक यात्रियों की आवाजाही पूरी तरह बाधित नहीं की जा सकती। अदालत ने दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) से पूछा कि आखिर किस आधार पर एक साथ इतने मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और क्या इसके लिए कम दखल वाले वैकल्पिक उपायों पर विचार किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि दिल्ली मेट्रो केवल परिवहन का साधन नहीं बल्कि राजधानी की जीवनरेखा है। हर दिन लाखों लोग नौकरी, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए मेट्रो पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि सुरक्षा कारणों से स्टेशन बंद करने का निर्णय लिया जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आम नागरिकों को न्यूनतम असुविधा हो और निर्णय पूरी तरह आवश्यकता एवं अनुपातिकता के सिद्धांत पर आधारित हो।
यह मामला उस समय सामने आया जब राजधानी में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और संसद क्षेत्र के आसपास कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच DMRC ने सुरक्षा एजेंसियों की सलाह पर एक साथ 16 मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। इनमें राजीव चौक, जनपथ, मंडी हाउस, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट, पटेल चौक, लोक कल्याण मार्ग, सुप्रीम कोर्ट, आईटीओ, दिल्ली गेट, इंद्रप्रस्थ, खान मार्केट और अन्य प्रमुख स्टेशन शामिल रहे। हालांकि कुछ प्रमुख इंटरचेंज स्टेशनों पर केवल इंटरचेंज सुविधा चालू रखी गई थी, लेकिन यात्रियों को स्टेशन से बाहर निकलने या प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।
स्टेशनों के बंद होने का सबसे अधिक असर दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, छात्रों और रोजाना यात्रा करने वाले यात्रियों पर पड़ा। कई स्थानों पर बस स्टॉप और ऑटो स्टैंड पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। सार्वजनिक परिवहन पर अचानक बढ़े दबाव के कारण यात्रियों को घंटों तक इंतजार करना पड़ा, जबकि कई इलाकों में ऑटो और टैक्सी किरायों में भी तेज बढ़ोतरी की शिकायतें सामने आईं। अनेक यात्रियों ने कहा कि बिना पूर्व सूचना के स्टेशन बंद होने से उन्हें कार्यालयों और अन्य जरूरी स्थानों तक पहुंचने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन पूरे शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को प्रभावित करना नागरिकों के आवागमन के अधिकार पर प्रतिकूल असर डालता है। उनका कहना था कि प्रशासन को केवल संवेदनशील क्षेत्रों तक प्रतिबंध सीमित रखने चाहिए और व्यापक स्तर पर मेट्रो स्टेशन बंद करना अंतिम विकल्प होना चाहिए। इस पर अदालत ने प्रशासन से विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में आम जनता को कम से कम असुविधा पहुंचाने के लिए क्या नीति अपनाई जाएगी।
दिल्ली पुलिस का पक्ष है कि संसद क्षेत्र और मध्य दिल्ली में चल रहे प्रदर्शनों के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के आधार पर यह कदम उठाया गया था। प्रशासन का कहना है कि भीड़ नियंत्रण, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी अप्रिय घटना को रोकने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया तथा हालात सामान्य होते ही स्टेशनों को चरणबद्ध तरीके से फिर से खोला जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ आम नागरिकों की दैनिक जीवनचर्या और निर्बाध आवाजाही के अधिकार की भी समान रूप से रक्षा की जानी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई में अदालत प्रशासन से विस्तृत जवाब मिलने के बाद आगे की दिशा तय करेगी।

