केन्द्र की अधिसूचना के बाद हरकत में आया किसान कल्याण विभाग, निर्माता कंपनियों को स्टॉक नष्ट करने और सर्टिफिकेट लौटाने के सख्त निर्देश
साईडलुक, जबलपुर। मध्यप्रदेश की खेती और जनस्वास्थ्य से जुड़ी एक बेहद अहम खबर सामने आई है। राज्य शासन ने मानव जीवन और पशुधन के लिए बेहद घातक माने जाने वाले खरपतवारनाशी पैराक्वेट डाइक्लोराइड के उपयोग, विक्रय और भण्डारण पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह वही जहरीला रसायन है जिसे बाजार में ग्रामोक्सोन जैसे ट्रेड नाम से बेचा जाता रहा है।
राज्य के किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग ने इस संबंध में सभी जिलों के उप संचालक कृषि और कीटनाशी निरीक्षकों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। विभाग ने साफ कहा है कि जिन निर्माता कंपनियों के पास पैराक्वेट डाइक्लोराइड का पंजीकरण प्रमाण पत्र है, वे उसे तत्काल केन्द्रीय कीटनाशी बोर्ड और पंजीकरण समिति को वापस करें। साथ ही बाजार में पड़े बचे हुए स्टॉक को वापस बुलाकर नियमों के तहत नष्ट करने की कार्रवाई शुरू की जाए।
केन्द्र सरकार ने पहले ही जारी कर दिया था अंतिम आदेश
यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 22 सितंबर 2026 को एसओ 5234 (ई) के तहत अंतिम अधिसूचना जारी कर दी थी। इस अधिसूचना में कीटनाशक अधिनियम 1968 की धारा 27(2) और 28 के तहत पैराक्वेट डाइक्लोराइड के नए पंजीकरण पर रोक और पहले से जारी सभी पंजीकरण प्रमाण पत्रों को रद्द करने का आदेश दिया गया था।
इससे पहले 10 जुलाई 2026 को सरकार ने एसओ 3800 (ई) के तहत ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर 30 दिन के भीतर आम जनता, वैज्ञानिकों और कंपनियों से आपत्ति और सुझाव मांगे थे। सरकार ने 14 जनवरी 2026 को इस रसायन की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसने 12 जून 2026 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसके बाद पंजीकरण समिति ने जून के अंतिम सप्ताह में अपनी 473वीं बैठक में इस रिपोर्ट पर विस्तार से चर्चा की और केन्द्र को प्रतिबंध की सिफारिश भेजी थी।
क्यों इतना खतरनाक है यह रसायन
पैराक्वेट डाइक्लोराइड एक गैर-चयनात्मक संपर्क शाकनाशी है। यह पौधों के हरे हिस्से के संपर्क में आते ही उन्हें 24 से 72 घंटे के भीतर जला कर पूरी तरह नष्ट कर देता है। इसी तेज असर के कारण किसान इसका दुरुपयोग करने लगे थे।
जांच में सामने आया है कि भारत में इसका पंजीकरण सिर्फ खरपतवार नियंत्रण के लिए था, मूंग या सोयाबीन की फसल को सुखाने के लिए नहीं। लेकिन बालाघाट, जबलपुर, निमाड़ और मालवा अंचल में किसान मूंग की फसल की कटाई से ठीक पहले इसका छिड़काव पत्तियों को सुखाने और फसल को जल्दी पकाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर करते रहे हैं। इससे थ्रेसिंग आसान हो जाती है और मजदूरी का खर्च बचता है, लेकिन दाने में इसका जहरीला अवशेष रह जाता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह दुनिया के सबसे जहरीले हर्बिसाइड में से एक है। इसकी चंद बूंदें भी अगर शरीर में चली जाएं तो फेफड़ों में फाइब्रोसिस और किडनी फेलियर शुरू हो जाता है। सबसे डरावनी बात यह है कि दुनिया भर में आज तक इसका कोई विशिष्ट एंटीडोट यानी विषरोधी इलाज विकसित नहीं हो सका है। दुनिया के लगभग 70 से अधिक देशों में यह पहले से ही प्रतिबंधित या गंभीर रूप से प्रतिबंधित है। भारत में भी वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और पर्यावरण संगठनों ने लंबे समय से इसकी मांग की थी।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्ष 2024 में देश में 34 हजार से अधिक मौतें कीटनाशी से जुड़ी रही हैं, जिनमें अकेले 26 हजार से अधिक मामले कीटनाशी पीकर आत्महत्या और 7821 मामले दुर्घटनावश जहर खाने के थे।
अब आगे क्या होगा
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि बिना वैध पंजीकरण के किसी भी कीटनाशी का निर्माण, आयात, परिवहन, विक्रय और उपयोग कानूनन अपराध है। इसलिए पैराक्वेट डाइक्लोराइड का बाजार से पूरी तरह हटना तय है। जो कंपनियां सर्टिफिकेट वापस नहीं करेंगी, उनके खिलाफ कीटनाशक अधिनियम के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। कृषि विभाग की टीमों को अब बाजार में सघन जांच के निर्देश दिए गए हैं।
किसानों से अपील की गई है कि वे इस प्रतिबंधित रसायन का उपयोग बिल्कुल न करें और इसके विकल्प के तौर पर विभाग द्वारा अनुशंसित सुरक्षित खरपतवार प्रबंधन उपायों को अपनाएं।

