11 साल पुराने डांगावास हत्याकांड में सभी 40 आरोपियों के बरी होने के बाद गरमाया राजस्थान, जमीन विवाद से शुरू हुई हिंसा में पांच दलितों समेत छह लोगों की हुई थी मौत
साईडलुक, डेस्क। राजस्थान के बहुचर्चित डांगावास हत्याकांड में 11 साल बाद आए अदालत के फैसले ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और दलित अधिकारों की बहस को तेज कर दिया है। नागौर जिले के मेड़ता स्थित विशेष एससी-एसटी अदालत ने 2015 के इस मामले में सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत का फैसला सामने आने के बाद पीड़ित परिवारों और दलित संगठनों की ओर से न्याय को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद जयपुर पहुंचे हैं और विधानसभा घेराव का आह्वान किया गया है।
डांगावास प्रकरण केवल एक आपराधिक मुकदमे का मामला नहीं है। इसके पीछे जमीन के अधिकार को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद, दो पक्षों के बीच तनाव, हिंसक टकराव और उसके बाद हुई मौतों की कहानी है। 14 मई 2015 को हुई हिंसा में पांच दलितों सहित छह लोगों की जान गई थी। मामले की सुनवाई लगभग 11 वर्षों तक चली और अंततः अदालत ने अभियोजन द्वारा आरोपियों की व्यक्तिगत भूमिका संदेह से परे साबित नहीं कर पाने के आधार पर सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया।
‘घटना हुई, लेकिन किसने की हत्या यह साबित नहीं हो सका’
इस फैसले का सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि जब अदालत ने हिंसक घटना और मौतों के तथ्य को खारिज नहीं किया, लेकिन किसी आरोपी की भूमिका को पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य से सिद्ध नहीं माना, तो पांच दलितों और एक अन्य व्यक्ति की मौत के लिए जिम्मेदार कौन था।
रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभासों और जांच की कमियों को महत्वपूर्ण माना। पुलिस, सीबीआई और अदालत के सामने कुछ गवाहों के बयानों में अंतर पाया गया। अदालत के सामने अभियोजन यह स्थापित नहीं कर सका कि आरोपपत्र में शामिल सभी 40 आरोपी हत्या और हिंसा में किस निश्चित भूमिका में शामिल थे। इसी कारण आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।
जमीन विवाद से शुरू हुआ था पूरा संघर्ष
डांगावास कांड की जड़ जमीन के विवाद में बताई जाती है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह जमीन दशकों पहले दलित परिवार को आवंटित की गई थी। जमीन के इस्तेमाल और कब्जे को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ता गया और 14 मई 2015 को मामला हिंसक टकराव में बदल गया।
घटना में पांच दलितों की मौत हुई। एक अन्य व्यक्ति की भी जान गई। आरोपों के अनुसार कुछ लोगों को ट्रैक्टरों से कुचला गया था। इस घटना के बाद राजस्थान में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया हुई तथा मामले की जांच को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे।
40 आरोपी थे कटघरे में, लेकिन अदालत में अभियोजन की कहानी नहीं टिक सकी
इस मामले में कुल 40 लोगों को आरोपी बनाया गया था। मुकदमे की लंबी सुनवाई के बाद विशेष अदालत ने सभी को बरी कर दिया। फैसले के पीछे मुख्य कारण अभियोजन द्वारा प्रत्येक आरोपी की भूमिका को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर स्थापित नहीं कर पाना रहा।
अदालत ने जांच के दौरान पुलिस और सीबीआई की कार्रवाई में भी विरोधाभासों का उल्लेख किया। अलग-अलग स्तर पर दर्ज बयानों में अंतर और जांच की कमियों ने अभियोजन के मामले को कमजोर किया। न्यायालय के लिए केवल यह साबित होना पर्याप्त नहीं था कि हिंसा हुई थी, बल्कि प्रत्येक आरोपी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को कानूनी कसौटी पर संदेह से परे साबित करना भी आवश्यक था।
फैसले के बाद चंद्रशेखर आजाद का जयपुर मार्च
फैसले के बाद दलित संगठनों और आजाद समाज पार्टी ने इसे लेकर राजस्थान सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 21 अगस्त को जयपुर में विधानसभा घेराव का आह्वान किया गया। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों से ‘जयपुर चलो’ और डांगावास मामले में न्याय की मांग को लेकर अभियान चलाया जा रहा था।
आंदोलन का केंद्रीय सवाल है कि अगर 40 आरोपी अदालत से बरी हो गए और घटना में पांच दलितों सहित छह लोगों की मौत हुई थी, तो फिर उन मौतों के लिए जिम्मेदारी तय कैसे होगी। यह सवाल अब केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि राजस्थान की कानून-व्यवस्था, जांच प्रक्रिया और कमजोर वर्गों को न्याय मिलने की व्यवस्था पर भी बहस खड़ी कर रहा है।
मानवाधिकार आयोग भी फैसले से संतुष्ट नहीं
डांगावास मामले में निचली अदालत के फैसले के बाद राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी चिंता जताई है। आयोग ने मामले में हाईकोर्ट के समक्ष अपील किए जाने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। इससे साफ है कि मामला निचली अदालत के फैसले के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा और न्यायिक स्तर पर आगे की संभावनाएं बनी हुई हैं।
पीड़ित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल
ग्यारह साल तक अदालत में चले मुकदमे के बाद आरोपियों का बरी होना पीड़ित परिवारों के लिए बड़ा झटका है। उनके सामने वही सवाल खड़ा है जो इस मामले को फिर से सुर्खियों में ले आया है—अगर सभी आरोपी बरी हो गए तो उनके परिवार के लोगों की हत्या किसने की?
यह सवाल भावनात्मक जरूर है, लेकिन इसका जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं बल्कि कानून के दायरे में आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही मिल सकता है। अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने हिंसा या मौतों को झूठा बताया है। फैसला मूलतः इस बात पर केंद्रित है कि अभियोजन उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपियों की व्यक्तिगत आपराधिक भूमिका को संदेह से परे साबित कर पाया या नहीं।
जयपुर में आंदोलन से बढ़ सकता है राजनीतिक दबाव
चंद्रशेखर आजाद के जयपुर पहुंचने और विधानसभा घेराव के आह्वान के बाद डांगावास मामला राजस्थान की राजनीति के केंद्र में आ गया है। आंदोलनकारियों की मांग न्यायिक समीक्षा, जिम्मेदारी तय करने और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने से जुड़ी है। प्रशासन के सामने चुनौती यह होगी कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए आंदोलनकारियों को अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अवसर भी मिले।
डांगावास की घटना को 11 साल बीत चुके हैं। इस दौरान जांच बदली, मामला अदालत पहुंचा और लंबी सुनवाई के बाद सभी 40 आरोपी बरी हो गए। लेकिन इस फैसले ने उस पुराने घाव को फिर खोल दिया है जिसे पीड़ित परिवार शायद कभी भूल ही नहीं पाए। अब निगाहें इस बात पर हैं कि आगे हाईकोर्ट में क्या होता है और क्या जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया उन सवालों का जवाब दे पाती है जो 14 मई 2015 की उस हिंसा के बाद से आज तक अनुत्तरित हैं।

