पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से किया इनकार; 30 हजार से ज्यादा लोगों की भीड़, करीब 5 हजार जवान तैनात होने का दावा, 240 से अधिक पुलिसकर्मी और करीब 200 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की बात
साईडलुक, नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के प्रदर्शन और संसद की ओर प्रस्तावित मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर चल रही सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में दिल्ली पुलिस ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक या गैरकानूनी बल प्रयोग के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि हालात बिगड़ने के बाद अधिकतम संयम और न्यूनतम आवश्यक बल की नीति अपनाई गई। पुलिस का दावा है कि भीड़ में असामाजिक तत्व और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल हो गए थे और बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश के बाद स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी।
दिल्ली पुलिस का यह जवाब उन याचिकाओं के सिलसिले में दाखिल किया गया है जिनमें प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर कथित बर्बरता, लाठीचार्ज और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की स्वतंत्र अथवा न्यायिक निगरानी में जांच की मांग की गई है। मामला शैलेंद्र मणि त्रिपाठी बनाम भारत सरकार एवं अन्य, W.P. (Crl.) 280/2026 के रूप में सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पुलिस ने कहा है कि बल प्रयोग से जुड़े आरोपों की विस्तृत जांच यदि अदालत द्वारा गठित किसी समिति के जरिए होती है तो वह उसमें सहयोग करेगी।
30 हजार की भीड़ और 5 हजार पुलिसकर्मी का दावा
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर और आसपास के लगभग तीन किलोमीटर के इलाके में 30 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। पुलिस के अनुसार भीड़ को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए करीब 5 हजार पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे।
पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन बाद में भीड़ के कुछ हिस्सों ने अलग-अलग स्थानों पर बैरिकेड तोड़ने और संसद की ओर आगे बढ़ने का प्रयास किया। इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की तथा झड़प की स्थिति बनी और पुलिस ने चरणबद्ध तरीके से बल प्रयोग किया।
पुलिस ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि संसद मार्च के लिए अनुमति नहीं दी गई थी। इसी आधार पर उसने संसद की ओर बढ़ने के प्रयास को गैरकानूनी बताया और कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करना जरूरी हो गया था।
240 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल, करीब 200 प्रदर्शनकारियों का मेडिकल
हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने दोनों पक्षों के घायल होने का आंकड़ा भी रखा है। पुलिस के मुताबिक झड़प के दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मी और अन्य वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी घायल हुए, जबकि करीब 200 प्रदर्शनकारियों और आम लोगों का मेडिको-लीगल परीक्षण कराया गया। एक अन्य हिस्से में पुलिस ने 218 घायल प्रदर्शनकारियों का आंकड़ा इस्तेमाल किया है। यानी उपलब्ध रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों के घायल होने का आंकड़ा लगभग 200 से 218 के बीच बताया गया है।
यह आंकड़ा इस विवाद में महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुलिस अपने ऊपर लगाए गए अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों के जवाब में सुरक्षाकर्मियों की चोटों को भी अपने तर्क का हिस्सा बना रही है। पुलिस का कहना है कि इतनी बड़ी भीड़ के बीच हुई झड़प में दोनों पक्षों के लोगों का घायल होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि पुलिस ने अनिवार्य रूप से अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया।
हालांकि, किस पक्ष का बल कितना और किस परिस्थिति में इस्तेमाल हुआ, यह सवाल अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन है। पुलिस का हलफनामा अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।
‘असामाजिक तत्वों और हिस्ट्रीशीटरों ने प्रदर्शन में घुसपैठ की’
हलफनामे का सबसे चर्चित दावा प्रदर्शनकारियों की कथित आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर है। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शन में ऐसे लोग भी शामिल हुए जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था और जिन्होंने कथित तौर पर माहौल बिगाड़ने में भूमिका निभाई।
पुलिस के अनुसार चेहरे की पहचान तकनीक और दूसरे डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई है जिनके खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस ने बताया कि इन मामलों में हत्या, हत्या का प्रयास, डकैती, दुष्कर्म, अपहरण, पॉक्सो, हथियार और मादक पदार्थों से संबंधित गंभीर आरोप शामिल हैं।
पुलिस का कहना है कि इन लोगों की भूमिका की आगे जांच की जाएगी और इस संबंध में दिल्ली पुलिस आयुक्त द्वारा गठित विशेष जांच तंत्र के माध्यम से पड़ताल होगी।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR या आपराधिक मामला दर्ज होना अपने आप में उसके अपराधी साबित होने के बराबर नहीं है। जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, किसी व्यक्ति को अपराधी कहना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा। इसलिए पुलिस द्वारा बताए गए 2,873 लोगों का आंकड़ा “आपराधिक मामलों वाले लोगों” का पुलिस दावा है, दोषसिद्ध अपराधियों की संख्या नहीं।
सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी क्यों थे?
20 जुलाई के प्रदर्शन के वीडियो सामने आने के बाद सादे कपड़ों में लाठी लिए कुछ लोगों की मौजूदगी भी विवाद का मुद्दा बनी थी। दिल्ली पुलिस ने अदालत में इस पर भी सफाई दी है।
पुलिस ने ऐसे अधिकारियों को ‘स्पॉटर्स’ बताया और कहा कि बड़े सार्वजनिक आयोजनों तथा भीड़ वाले कार्यक्रमों में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती सामान्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। पुलिस के अनुसार इनका उद्देश्य भीड़ में घुल-मिलकर असामाजिक या आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर लोगों की मदद करना होता है।
पुलिस के अनुसार ये अधिकारी स्पेशल ब्रांच, स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच और स्थानीय पुलिस इकाइयों से लिए गए थे। पुलिस ने अदालत से कहा कि सादे कपड़ों में मौजूद अधिकारियों को नियमों के विपरीत बताना सही नहीं है।
दिल्ली पुलिस का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो घटनाक्रम के संदर्भ से काटकर दिखाए गए हैं। पुलिस ने अदालत में दावा किया कि केवल कुछ सेकंड के वीडियो या चुनिंदा तस्वीरों के आधार पर पूरे घटनाक्रम का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कील लगी लाठी पर भी पुलिस की सफाई
प्रदर्शन के दौरान कील लगी लाठी दिखाई देने वाले वीडियो को लेकर भी पुलिस ने अपना पक्ष रखा है। पुलिस का दावा है कि जिस डंडे को पुलिस की लाठी बताया जा रहा है, वह पुलिसकर्मी के हाथ में नहीं बल्कि प्रदर्शनकारी के पास था और उस पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था।
पुलिस ने यह भी कहा कि सामान्य लाठी पुलिस के लिए अनुमत उपकरण है और भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान उसका इस्तेमाल कानून के मुताबिक किया गया।
अब इस दावे की वास्तविकता वीडियो फुटेज, मौके के अन्य रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के जरिए ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
फेशियल रिकग्निशन पर भी उठे सवाल
प्रदर्शन के दौरान चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट के सामने है। दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि इस तकनीक का इस्तेमाल हर प्रदर्शनकारी की व्यापक निगरानी या व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करने के लिए नहीं किया गया।
पुलिस का दावा है कि तकनीक का इस्तेमाल गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान में सहायता के लिए किया गया और केवल चेहरे की पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस के अनुसार किसी संभावित मैच की पुष्टि के लिए फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी बड़े सार्वजनिक प्रदर्शन में चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल से निजता और निगरानी की सीमा से जुड़े संवैधानिक प्रश्न भी उठते हैं।
पुलिस ने कहा: सोशल मीडिया सामग्री ‘अधूरी तस्वीर’ देती है
दिल्ली पुलिस ने याचिकाकर्ताओं के उस पक्ष पर भी सवाल उठाया जिसमें सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो को पुलिस कार्रवाई के प्रमाण के रूप में पेश किया गया है।
पुलिस का कहना है कि याचिकाओं में चुनिंदा तस्वीरों, अधूरे वीडियो और ऐसे मीडिया या सोशल मीडिया पोस्ट का इस्तेमाल किया गया है जिनका स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पुलिस के मुताबिक इससे घटनाक्रम का एकतरफा चित्र सामने आता है।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई के वीडियो और घायल लोगों के मेडिकल दस्तावेजों को पुलिस बल प्रयोग की जांच के आधार के रूप में देखने की मांग की गई है। इसलिए अब अदालत के सामने मूल वीडियो फुटेज, मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस ड्यूटी रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही ‘क्रिमिनल एंटिसीडेंट्स’ पर स्थिति स्पष्ट कर चुका है
इस मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 3 अगस्त को सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसके पहले के आदेश में इस्तेमाल किया गया “criminal antecedents” शब्द गंभीर और जघन्य अपराधों के संदर्भ में समझा जाएगा। अदालत ने राज्यों को कानून के अनुसार FIR बंद या वापस लेने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी दी थी।
इस पृष्ठभूमि में दिल्ली पुलिस द्वारा 2,873 लोगों के आपराधिक मामलों का उल्लेख किए जाने को भी इसी न्यायिक संदर्भ में पढ़ना होगा। केवल पुराने या मामूली मामलों की मौजूदगी को गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि के बराबर मानना सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्याख्या से अलग होगा।
मामला अभी आरोप बनाम आरोप का है
इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली पुलिस का हलफनामा *पुलिस का पक्ष है, अदालत का फैसला नहीं*। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया था या नहीं।
एक तरफ प्रदर्शनकारियों की याचिकाओं में पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसने पहले संयम बरता, लेकिन जब बैरिकेड तोड़े गए और भीड़ संसद की ओर बढ़ने लगी तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्रमिक बल प्रयोग करना पड़ा।
यानी अदालत के सामने अब एक ही घटना की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें हैं।
अब जांच से खुलेगा लाठीचार्ज का पूरा सच
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही संकेत दिया है कि पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच के लिए समिति गठित करने पर विचार किया जा रहा है। दिल्ली पुलिस ने भी कहा है कि बल प्रयोग की वैधता और अनुपातिकता की जांच अदालत द्वारा गठित तंत्र के सामने की जा सकती है और वह सहयोग करेगी।
ऐसे में आने वाले समय में सीसीटीवी और वीडियो फुटेज, पुलिस बॉडी-कैमरा या उपलब्ध रिकॉर्डिंग, मेडिकल रिपोर्ट, ड्यूटी चार्ट, वायरलेस लॉग, गिरफ्तारियों के रिकॉर्ड और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिसकर्मियों के बयान इस मामले में निर्णायक महत्व रख सकते हैं।
फिलहाल दिल्ली पुलिस का आधिकारिक दावा यही है कि 20 जुलाई के 1CJP प्रदर्शन में अत्यधिक बल प्रयोग नहीं हुआ, भीड़ का एक हिस्सा हिंसक हुआ और उसमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल थे। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अंतिम सच अदालत के सामने मौजूद साक्ष्यों और प्रस्तावित स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आएगा।

