साईडलुक विशेष। इस वर्ष करवाचौथ 10 अक्टूबर 2025 को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:57 बजे से लेकर 7:11 बजे तक रहेगा। व्रती महिलाएं सुबह 6:19 बजे से लेकर चंद्र दर्शन तक यानी रात 8:13 बजे तक उपवास रखेंगी। इस दिन चंद्रमा का उदय लगभग रात 8:13 बजे होने की संभावना है, जिसके बाद चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देकर व्रत खोला जाएगा।
करवाचौथ: प्रेम, श्रद्धा और व्रत की पावन परंपरा
हर साल हिंदू विवाहित महिलाएँ एक दिन का पूर्ण उपवास रखकर चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलती हैं और अपने पति की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की कामना करती हैं। यह व्रत करवाचौथ कहलाता है, और इसे “करका चतुर्थी” नाम से भी जाना जाता है। “करवा” का अर्थ मिट्टी का कलश या पात्र और “चौथ” का अर्थ चतुर्थी (चतुर्थ तिथि) है। इसे संस्कृत में करक चतुर्थी कहा गया है। पुराणों और लोककथाओं में कई प्रसंग मौजूद हैं। एक प्रसिद्ध कथा है वीरवती की, जिन्होंने करवाचौथ व्रत से अपने पति की मृत्यु को टाला। कुछ कथाएं महाभारत काल से जुड़ी हैं, जैसे द्रौपदी के व्रत का उल्लेख, जिनकी कथा सुनने से व्रत पूरी माना जाता है।
करवाचौथ की प्रमुख कथा
करवाचौथ की सबसे प्रसिद्ध कथा रानी वीरवती की है, जो इस व्रत की महत्ता को दर्शाती है। वीरवती एक सुंदर और धर्मपरायण रानी थीं। विवाह के बाद उनका पहला करवाचौथ व्रत था। उन्होंने दिनभर निर्जला उपवास रखा, लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलता गया, भूख-प्यास से उनकी हालत खराब होने लगी। उनके सात भाइयों से यह देखा नहीं गया, और उन्होंने बहन को व्रत तुड़वाने के लिए चाल चली। उन्होंने एक पीपल के पेड़ के पीछे आईना टांग कर उसे चाँद का प्रतिबिंब दिखाया और कहा कि चाँद निकल आया है। वीरवती ने चंद्रदर्शन कर व्रत तोड़ दिया। जैसे ही उसने पहला निवाला खाया, कुछ ही समय में उसके पति की मृत्यु का समाचार आया। वह सदमे में चली गई और तड़पते हुए उसने पूरी घटना जानने के लिए तपस्या शुरू की। अंत में, देवी पार्वती प्रकट हुईं और वीरवती को बताया कि उसका व्रत अधूरा और छलपूर्वक तोड़ा गया था। देवी के निर्देश पर वीरवती ने करवाचौथ व्रत को पूरी श्रद्धा और विधिपूर्वक दोबारा रखा, और अगली बार उसके पति को जीवनदान प्राप्त हुआ। इसलिए करवाचौथ व्रत को पूर्ण श्रद्धा, संयम और नियमों से करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इस कथा को महिलाएं करवाचौथ की पूजा के समय सुनती और सुनाती हैं।
पूजा कैसे करें, संक्षिप्त विधि
सुबह संगी सरगी (Sargi) लें। व्रत से पहले माता–सास द्वारा फल, मिठाई आदि दी जाती है। दिनभर उपवास (निराला व्रत) रखें। भोजन और जल दोनों से परहेज। शाम को श्रद्धा सहित पारंपरिक वस्त्र, मेहँदी आदि लगाकर सज-धज कर बैठें। पूजा थाली सजाएँ, करवा (मिट्टी का पात्र), दीपक, फल, मिठाइयाँ, चावल, सिंदूर आदि रखें। कथा सुनें या पढ़ें, करवा चौथ व्रत कथा सुनना शुभ माना जाता है। चांद निकलने पर चलनी से चंद्रमा देखें और उन्हें अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बाद पति की ओर देखते हुए व्रत खोलें, पानी या फल ग्रहण करें।
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