साईडलुक, सत्यजीत यादव। शिक्षा वह हुनर है जो बच्चे को इंसान बनाता है, मशीन नहीं। लेकिन मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ मासूमियत को परख की कसौटी पर कसा जा रहा है और समानता के संवैधानिक अधिकार को तार-तार किया जा रहा है। एक तरफ केंद्र की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) खेल-खेल में सीखने की बात करती है, तो दूसरी तरफ प्रदेश की व्यवस्था पाँचवीं कक्षा के बच्चे के कोमल कंधों पर बोर्ड परीक्षा का ऐसा बोझ रख देती है, मानो वह कोई परीक्षा नहीं, बल्कि उसके बचपन का अंतिम संस्कार हो। यह लेख उन्हीं अनकहे सवालों की आवाज है, जो हर अभिभावक के मन में उठते हैं, लेकिन शायद सरकारी दफ्तरों की ऊंची दीवारों तक नहीं पहुंच पाते।
मासूमियत की पहली मौत: जब खेल-खेल में पढ़ाई बन जाती है रट्टा मारने की जंग…
बचपन का सबसे बड़ा गुण होता है उसकी जिज्ञासा। एक बच्चा तितली को देखकर सवाल करता है, बादलों को देखकर कल्पना करता है, और हर नई चीज़ को खेल-खेल में सीखता है। यही मासूमियत होती है। लेकिन मध्य प्रदेश के स्कूलों में यह मासूमियत बेरहमी से कुचली जा रही है। दस साल का बच्चा, जिसे अभी अपने आस-पास की दुनिया को समझना है, उससे सौ से अधिक पाठों को रटने की अपेक्षा की जाती है। उससे पूछा नहीं जाता कि उसने क्या समझा, बल्कि उससे माँगा जाता है कि वह किताब के शब्दों को यथावत दोहराए। यह व्यवस्था उसके अंदर के कलाकार, वैज्ञानिक और चिंतक को जन्म से पहले ही मार देती है। परीक्षा के नाम पर डाला गया यह मानसिक दबाव उसकी आँखों की चमक छीन लेता है और उसकी जिज्ञासा को भय में बदल देता है। जब बच्चा सीखने के बजाय सिर्फ पास होने की सोचने लगता है, तो समझ लीजिए कि उसकी मासूमियत की मौत हो चुकी है।
दोहरी व्यवस्था, दोहरा मापदंड: एक ही शहर, दो बचपन…
समानता का अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का प्राण है, मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ा भेदभाव झेल रहा है। एक ही शहर, एक ही मुहल्ला, एक ही उम्र के दो बच्चे। एक पढ़ता है महंगे सीबीएसई स्कूल में, जहाँ उसका मूल्यांकन साल भर की गतिविधियों, प्रोजेक्ट और आंतरिक परीक्षाओं के आधार पर होता है। वहाँ बोर्ड का डर नहीं, फेल होने की रातों की नींद उड़ाने वाली चिंता नहीं। वह बच्चा खुलकर सीखता है, गलतियाँ करता है और उनसे सीखता है। दूसरा बच्चा, जिसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति उसे उसी स्कूल में दाखिला नहीं दिला पाती, वह एमपी बोर्ड के स्कूल में जाता है। उसके लिए साल का अंत यानी बोर्ड परीक्षा का डर। उसके लिए पाँचवीं कक्षा का मतलब बोर्ड पैटर्न, अनजान परीक्षा केंद्र और फेल होने का साया। यह वही राज्य है, जहाँ शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत लॉटरी से स्कूलों में दाखिले होते हैं। विडंबना देखिए कि लॉटरी का खेल यह तय करता है कि कौन सा बच्चा तनावमुक्त शिक्षा पाएगा और कौन सा बच्चा परीक्षा के चक्रव्यूह में फँसेगा। क्या यह समानता नहीं है? क्या यह आर्थिक स्थिति के आधार पर बच्चों का वर्गीकरण नहीं है?
समानता के अधिकार का हनन: जब सरकार ही बन जाती है भेदभाव की वजह…
राज्य सरकार की यह दोहरी नीति संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार है। एक तरफ सरकार ‘बाला’ पद्धति और बस्ते के वजन कम करने की बात करती है, जैसे कि वह बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील हो। लेकिन दूसरी तरफ वही सरकार पाँचवीं कक्षा के बच्चे को फेल करने का कानूनी अधिकार रखती है। आठवीं तक फेल न करने की नीति से हटकर जब राज्य ने फेल करने की व्यवस्था बनाई, तो उसका तर्क था ‘गुणवत्ता में सुधार’। लेकिन क्या गुणवत्ता का सुधार डर से होता है? क्या एक दस साल के बच्चे को फेल करना, उसका आत्मविश्वास तोड़ना, उसे शिक्षा से दूर भगाना, गुणवत्ता सुधार का कोई तरीका हो सकता है? सीबीएसई जैसे बोर्ड जहाँ आठवीं कक्षा तक आंतरिक मूल्यांकन को अनिवार्य मानते हैं, वहीं एमपी बोर्ड पाँचवीं कक्षा से ही बच्चों को बोर्ड परीक्षा के नाम पर मानसिक यातना दे रहा है। यह सीधा-सीधा यह साबित करता है कि राज्य में दो तरह की शिक्षा व्यवस्था है, एक अमीरों के लिए, जो तनावमुक्त है, और एक गरीबों के लिए, जो डर पर आधारित है।
मासूमियत पर खतरा: असुरक्षित सफर और अनजान माहौल का दंश…
जब पाँचवीं कक्षा का एक बच्चा, जिसने अब तक केवल अपने स्कूल की चारदीवारी देखी है, उसे परीक्षा के दिन एक अनजान स्कूल में भेजा जाता है, तो उसके मन में जो डर पैदा होता है, वह उसकी पूरी शैक्षिक यात्रा पर हावी हो जाता है। घर से चार-पाँच किलोमीटर दूर, अपरिचित रास्ते, अनजान शिक्षक और अजनबी माहौल, यह सब उस छोटे से बच्चे के लिए किसी सजा से कम नहीं है। वह अभिभावक जो दिहाड़ी मजदूरी करता है, उसके लिए बच्चे को दूर परीक्षा केंद्र पर छोड़ना और वापस लाना आर्थिक और समय, दोनों दृष्टि से बड़ी चुनौती है। कई बार बच्चे अकेले ही इस सफर पर निकलते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार इन मासूमों की सुरक्षा की गारंटी दे सकती है? क्या सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि परीक्षा के नाम पर बच्चे सड़कों पर असुरक्षित न हों? यह व्यवस्था न सिर्फ मासूमियत पर खतरा है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के अधिकार का भी उल्लंघन है।
अब समय है बचपन बचाने का…
शिक्षा का असली उद्देश्य बच्चों को सशक्त बनाना है, उन्हें डराना नहीं। जब हम एक ओर एनईपी 2020 की सिफारिशों पर गर्व करते हैं और दूसरी ओर पाँचवीं कक्षा के बच्चे पर बोर्ड परीक्षा का बोझ लादते हैं, तो यह नीतिगत पाखंड कहलाता है। जब हम एक ही शहर में एक बच्चे को सीबीएसई की तनावमुक्त शिक्षा देते हैं और दूसरे बच्चे को एमपी बोर्ड की डरावनी परीक्षा, तो यह समानता के अधिकार का मजाक उड़ाना है।
मध्य प्रदेश सरकार को अब जागना होगा। मासूम बच्चों का बचपन कोई परीक्षण का मैदान नहीं है। बोर्ड परीक्षा का यह चक्रव्यूह तोड़ना होगा। पाँचवीं और आठवीं की परीक्षाओं से बोर्ड पैटर्न हटाकर आंतरिक मूल्यांकन लागू करना होगा। सीबीएसई और एमपी बोर्ड के बीच की इस खाई को पाटना होगा। तभी हम सच में कह पाएंगे कि हमने बच्चों को उनका हक दिया, एक खुशहाल, तनावमुक्त और सुरक्षित बचपन। वरना हमारी शिक्षा व्यवस्था इतिहास में उस कालखंड के रूप में याद की जाएगी, जहाँ मासूमियत की चीखें सुनने वाला कोई नहीं था और समानता के अधिकार को सिर्फ किताबों तक सीमित रखा गया था।

