रिकॉर्ड उत्पादन और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई पर उठे सवाल
साईडलुक, (सत्यजीत यादव)। मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड (एमपीपीजीसीएल) ने अमरकंटक ताप विद्युत गृह चचाई की 210 मेगावाट क्षमता वाली यूनिट नंबर-5 के लगातार 609 दिनों तक निर्बाध बिजली उत्पादन का रिकॉर्ड बनाकर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था की बड़ी उपलब्धि का दावा किया है। ऊर्जा मंत्री से लेकर विभाग के शीर्ष अधिकारियों तक ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताते हुए कर्मचारियों और अभियंताओं की सराहना की है। इससे पहले यही यूनिट 500 दिनों तक लगातार उत्पादन कर राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रही थी।
लेकिन इस सरकारी उत्सव और प्रेस विज्ञप्ति के बीच प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं का एक सीधा सवाल है, यदि उत्पादन इतना शानदार है तो फिर आए दिन बिजली कटौती, लो-वोल्टेज और ट्रिपिंग की शिकायतें क्यों सामने आती हैं?
सरकार और बिजली कंपनियां उत्पादन के रिकॉर्ड गिना रही हैं, जबकि दूसरी ओर कई शहरों और कस्बों में गर्मी, बारिश या तेज हवा के दौरान घंटों बिजली गुल होने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। हाल ही में स्वयं ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर को इंदौर में उपभोक्ताओं की शिकायतों के बाद अधिकारियों को नोटिस जारी करना पड़ा था। स्थानीय लोगों ने बार-बार बिजली कटौती और आपूर्ति में अव्यवस्था की शिकायत की थी।
उत्पादन बढ़ा, लेकिन वितरण व्यवस्था बनी चुनौती
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली उत्पादन और उपभोक्ताओं तक निर्बाध आपूर्ति दो अलग-अलग विषय हैं। चचाई प्लांट का रिकॉर्ड यह साबित करता है कि उत्पादन इकाइयां बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन वितरण नेटवर्क, ट्रांसफार्मर, फीडर और स्थानीय लाइनों की स्थिति अब भी कई क्षेत्रों में बड़ी चुनौती बनी हुई है।
मध्यप्रदेश ने वर्ष 2026 में लगभग 19,895 मेगावाट की रिकॉर्ड विद्युत मांग दर्ज की है, जो राज्य में लगातार बढ़ती बिजली खपत को दर्शाती है। बढ़ती मांग के साथ वितरण तंत्र पर दबाव भी बढ़ा है।
पूर्व सरकारों से लेकर वर्तमान तक, समस्या का स्वरूप बदला लेकिन खत्म नहीं हुआ
एक समय था जब मध्यप्रदेश को बिजली संकट वाले राज्यों में गिना जाता था। 2000 के दशक की शुरुआत में ग्रामीण क्षेत्रों में कई-कई घंटे की कटौती आम बात थी। बाद में उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए थर्मल और जल विद्युत प्रोजेक्ट शुरू करने तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के बाद प्रदेश बिजली सरप्लस राज्य होने का दावा करने लगा।
शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान प्रदेश ने खुद को “पावर सरप्लस स्टेट” घोषित किया था और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता विस्तार किया गया। वर्तमान सरकार भी उसी आधारभूत संरचना को आगे बढ़ाने का दावा करती है। हालांकि उपभोक्ताओं की शिकायतें यह संकेत देती हैं कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद अंतिम उपभोक्ता तक गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति सुनिश्चित करना अब भी चुनौती बना हुआ है।
सरकारी दावों के बीच उपभोक्ताओं की नाराजगी
बिजली विभाग के ही आंकड़े बताते हैं कि शिकायतों और बिजली चोरी जैसे मामलों के लिए विशेष अभियान चलाने पड़े हैं। हजारों शिकायतें विभागीय ऐप और हेल्पलाइन पर दर्ज हुई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि उपभोक्ता स्तर पर समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।
सोशल मीडिया और विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर भी उपभोक्ता बार-बार बिजली कटौती, मरम्मत में देरी और शिकायत निस्तारण को लेकर नाराजगी जताते रहे हैं।
उपलब्धि पर गर्व, लेकिन सवाल भी जरूरी
निस्संदेह 609 दिनों तक किसी थर्मल यूनिट का लगातार चलना तकनीकी दृष्टि से बड़ी उपलब्धि है। यह प्रदेश के अभियंताओं और कर्मचारियों की कार्यकुशलता का प्रमाण भी है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी उपलब्धि का अंतिम पैमाना जनता का अनुभव होता है।
यदि गांवों और शहरों में लोग अब भी अनियोजित कटौती, लो-वोल्टेज, ट्रांसफार्मर खराब होने और घंटों बिजली बाधित रहने की शिकायत कर रहे हैं, तो केवल उत्पादन रिकॉर्ड जनता की नाराजगी को दूर नहीं कर सकते।
चचाई ने इतिहास रचा है, इसमें कोई दो राय नहीं। मगर प्रदेश की जनता अब एक नया रिकॉर्ड देखना चाहती है, ऐसा रिकॉर्ड जिसमें बिजली उत्पादन के साथ-साथ उपभोक्ताओं को चौबीसों घंटे निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति भी मिले। आखिरकार आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह बल्ब है जो आम नागरिक के घर में लगातार जलता रहे।

