90 करोड़ रुपये की खरीद, कीमत के अंतर ने खड़े किए गंभीर सवाल; विपक्ष बोला—एक ही साइकिल के दाम में इतना बड़ा फर्क क्यों?
साईडलुक, नई दिल्ली। दिल्ली सरकार की ओर से सरकारी स्कूलों की छात्राओं को वितरित की जा रही साइकिलों की खरीद अब राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई है। आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि भाजपा नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने करीब 1.30 लाख साइकिलों की खरीद निर्धारित बाजार कीमत से काफी अधिक दर पर की और इस प्रक्रिया में सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया गया। आरोपों के केंद्र में सबसे बड़ा सवाल साइकिल की कीमत को लेकर है। AAP नेताओं का दावा है कि जिस तरह की साइकिल उन्होंने बाजार से लगभग ₹4,200 में खरीदी, उसी तरह की साइकिल के लिए दिल्ली सरकार ने टेंडर के माध्यम से ₹6,957 प्रति इकाई का भुगतान किया।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली सरकार की ‘विद्या वाहिनी’ पहल के तहत सरकारी स्कूलों की छात्राओं को साइकिल उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य छात्राओं के लिए स्कूल तक आने-जाने की सुविधा बेहतर करना और दूरी अथवा परिवहन की समस्या के कारण पढ़ाई प्रभावित होने से रोकना है। जुलाई के अंत में योजना के औपचारिक विस्तार के दौरान सरकार ने चरणबद्ध तरीके से बड़ी संख्या में छात्राओं को साइकिल देने की बात कही थी।
लेकिन योजना के उद्देश्य से अलग अब इसकी खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। AAP प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज समेत पार्टी के नेताओं ने दावा किया है कि दिल्ली सरकार ने लगभग 1.30 लाख साइकिलें ₹6,957 प्रति साइकिल की दर से खरीदी हैं, जबकि उन्होंने बाजार से कथित तौर पर इसी प्रकार की Hero साइकिल लगभग ₹4,200 में खरीदी। 10 अगस्त को AAP नेताओं ने इन्हीं आरोपों को लेकर साइकिल से दिल्ली विधानसभा पहुंचकर प्रदर्शन भी किया और शिक्षा मंत्री आशीष सूद के इस्तीफे की मांग की।
आंकड़ों का गणित क्या कहता है?
यदि ₹6,957 प्रति साइकिल की बताई गई खरीद दर और 1,30,000 साइकिलों की संख्या को आधार बनाया जाए तो कुल खरीद राशि करीब ₹90.44 करोड़ बैठती है। दूसरी ओर यदि वही साइकिल ₹4,200 प्रति इकाई में उपलब्ध थी, तो 1,30,000 साइकिलों की अनुमानित कीमत लगभग ₹54.60 करोड़ होती। दोनों राशियों में करीब ₹35.84 करोड़ का अंतर निकलता है।
यानी केवल उपलब्ध कराए गए इन दो आंकड़ों को गणितीय आधार पर देखें तो प्रति साइकिल ₹2,757 का अंतर दिखाई देता है। 1.30 लाख साइकिलों पर यही अंतर जोड़ने पर करीब ₹35.84 करोड़ की राशि बनती है। AAP नेताओं ने इसी कीमत के अंतर को लगभग ₹40 करोड़ बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। ₹4,200 का आंकड़ा AAP नेताओं द्वारा बाजार से खरीदी गई साइकिल की कीमत पर आधारित दावा है। इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि सरकार द्वारा खरीदी गई हर साइकिल बिल्कुल समान स्पेसिफिकेशन, वारंटी, परिवहन, टैक्स, पैकेजिंग, फिटिंग या अन्य अनुबंधित शर्तों वाली थी। इसलिए अंतिम रूप से सरकारी खरीद में वित्तीय अनियमितता साबित करने के लिए मूल टेंडर, तकनीकी विनिर्देश, तुलनात्मक बोली, आपूर्ति आदेश, बिल और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
‘एक ही साइकिल’ होने का दावा भी जांच के घेरे में
विवाद केवल कीमत तक सीमित नहीं है। AAP नेताओं ने दावा किया है कि उनके द्वारा बाजार से खरीदी गई साइकिल और छात्राओं को वितरित की जा रही साइकिल एक ही कंपनी की Hero साइकिल हैं। पार्टी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि दोनों साइकिलों के मॉडल और पहचान को लेकर सवाल हैं। AAP का कहना है कि उसके द्वारा खरीदी गई साइकिल को Bonfire मॉडल के रूप में दिखाया गया, जबकि छात्राओं को दी जा रही साइकिलों पर Skyler नाम का उल्लेख दिखाई देता है।
यदि दोनों साइकिलों के फ्रेम, पार्ट्स, स्पेसिफिकेशन और मॉडल वास्तव में समान पाए जाते हैं, तो कीमत का अंतर निश्चित रूप से जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। लेकिन यदि दोनों में तकनीकी या अनुबंध संबंधी अंतर मौजूद हैं तो केवल बाजार मूल्य की तुलना से खरीद को गलत ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। यही वह बिंदु है जहां सरकारी टेंडर और तकनीकी दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल
AAP विधायक संजीव झा ने आरोप लगाया है कि Hero Cycles ने भी टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, लेकिन अनुबंध किसी ट्रेडर को दिया गया। पार्टी का सवाल है कि यदि निर्माता कंपनी ने बोली लगाई थी और फिर भी किसी अन्य आपूर्तिकर्ता को ठेका मिला, तो चयन के आधार क्या थे। हालांकि यह आरोप भी अभी राजनीतिक पक्ष की ओर से लगाया गया है और इसकी स्वतंत्र सरकारी या जांच एजेंसी से पुष्टि सामने नहीं आई है।
यही कारण है कि पूरे मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए केवल साइकिल के खुदरा बाजार मूल्य को देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना होगा कि टेंडर में कौन-कौन से तकनीकी मानक निर्धारित किए गए थे, कितनी कंपनियों ने भाग लिया, किसने कितनी बोली लगाई, सबसे कम बोली किसकी थी, चयन किस आधार पर हुआ, अनुबंध में प्रति साइकिल कीमत में कौन-कौन से खर्च शामिल थे और वास्तविक भुगतान किस दर पर किया गया।
सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल—₹6,957 की कीमत कैसे तय हुई?
पूरे विवाद का सबसे सीधा सवाल यही है कि यदि एक समान या समान श्रेणी की साइकिल बाजार में लगभग ₹4,200 में उपलब्ध थी तो सरकारी खरीद में ₹6,957 की दर क्यों स्वीकार की गई। यदि दोनों साइकिलों में कोई तकनीकी अंतर था तो सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि वह अंतर क्या था और उसके कारण कीमत में कितना अतिरिक्त खर्च जुड़ा।
दूसरी ओर यदि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह प्रतिस्पर्धी थी और ₹6,957 की दर सभी आवश्यक खर्चों तथा निर्धारित तकनीकी मानकों के आधार पर तय हुई थी, तो सरकार के लिए खरीद दस्तावेज सार्वजनिक कर आरोपों का जवाब देना कठिन नहीं होना चाहिए।
करीब 90 करोड़ रुपये की खरीद, पारदर्शिता का सवाल बड़ा
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला छोटी संख्या में खरीदी गई वस्तुओं का नहीं है। 1.30 लाख साइकिलों की खरीद और ₹6,957 की प्रति इकाई दर के आधार पर पूरी खरीद का मूल्य लगभग ₹90.44 करोड़ बनता है। इतनी बड़ी सार्वजनिक खरीद में प्रति इकाई कुछ हजार रुपये का अंतर भी कुल राशि में करोड़ों रुपये का फर्क पैदा कर सकता है।
यही वजह है कि इस मामले को केवल सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप मानकर समाप्त करने के बजाय दस्तावेजों के आधार पर जांच की आवश्यकता है। यदि खरीद नियमों के अनुसार हुई है तो सरकार को इससे जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी या अनुचित भुगतान हुआ है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
छात्राओं के लिए योजना अच्छी, लेकिन खरीद पर जवाबदेही भी जरूरी
सरकारी स्कूलों की छात्राओं को मुफ्त साइकिल उपलब्ध कराना शिक्षा और परिवहन के लिहाज से उपयोगी पहल हो सकती है। सरकार का तर्क है कि इससे छात्राओं को स्कूल आने-जाने में सुविधा मिलेगी और परिवहन की समस्या के कारण पढ़ाई छोड़ने जैसी परिस्थितियों को कम किया जा सकेगा। ‘विद्या वाहिनी’ योजना के तहत सरकार ने चरणबद्ध रूप से बड़ी संख्या में साइकिल वितरण की घोषणा की है।
लेकिन किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता केवल उसके उद्देश्य से तय नहीं होती। उसमें खर्च होने वाला सार्वजनिक धन भी उतनी ही पारदर्शिता से खर्च होना चाहिए। छात्राओं के नाम पर खरीदी गई एक-एक साइकिल की कीमत यदि सवालों के घेरे में आती है तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह टेंडर और भुगतान से जुड़े तथ्य सामने रखे।
घोटाला साबित या कीमत का जायज अंतर—फैसला दस्तावेज करेंगे
फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर इसे प्रमाणित ‘साइकिल घोटाला’ कहना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि AAP ने 1.30 लाख साइकिलों की खरीद, ₹6,957 की प्रति साइकिल दर और लगभग ₹4,200 के कथित बाजार मूल्य के बीच बड़े अंतर का गंभीर आरोप लगाया है। गणितीय रूप से इन दरों के बीच करीब ₹35.84 करोड़ का अंतर बनता है, जबकि राजनीतिक आरोपों में इसे करीब ₹40 करोड़ बताया गया है।
अब निगाहें दिल्ली सरकार पर हैं कि वह बताए कि ₹6,957 की दर किस प्रक्रिया से तय हुई, टेंडर किसे मिला, कितनी कंपनियों ने भाग लिया, साइकिल की वास्तविक तकनीकी विशिष्टताएं क्या थीं और कुल भुगतान में कौन-कौन से खर्च शामिल थे। साथ ही विपक्ष को भी अपने ₹4,200 वाले दावे के समर्थन में उसी मॉडल, उसी स्पेसिफिकेशन और समान शर्तों वाले खरीद दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ साइकिल की कीमत का नहीं है। सवाल दिल्ली के सरकारी खजाने से खर्च होने वाले उन करोड़ों रुपयों का है, जिनका हर पैसा आखिरकार जनता के पास से आता है। यदि कीमत जायज है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए और यदि खरीद में गड़बड़ी है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। यही सार्वजनिक धन और सरकारी खरीद की पारदर्शिता का मूल सिद्धांत है।

