नोटबंदी के बाद भाजपा के संगठन विस्तार और सरकारी स्कूलों की घटती संख्या को लेकर सियासी बहस तेज, लेकिन आंकड़ों की पूरी तस्वीर कुछ और भी कहती है
साईडलुक, नई दिल्ली। देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अभिजीत दीपके ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया है कि नोटबंदी के बाद भाजपा ने देशभर में अपने जिला स्तर के कार्यालयों का विस्तार किया, लेकिन दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की संख्या में करीब 94 हजार की कमी दर्ज हो गई। उनका आरोप है कि जिन सरकारी स्कूलों की मरम्मत और सुविधाओं में सुधार किया जाना चाहिए था, उन्हें बंद या दूसरे स्कूलों में मिला दिया गया।
दीपके का यह बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, इस पूरे दावे की पड़ताल करने पर तस्वीर को थोड़ा अधिक सावधानी से समझने की जरूरत है। सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई। लेकिन इसे सीधे-सीधे “94 हजार स्कूलों पर ताला” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा, क्योंकि इस कमी में स्कूलों का विलय और युक्तिसंगतीकरण भी शामिल है।
नीति आयोग ने मई 2026 में जारी अपनी रिपोर्ट “School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement” में UDISE+ के आंकड़ों के आधार पर पिछले एक दशक की स्कूली शिक्षा व्यवस्था का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 में देश में 11,07,101 सरकारी स्कूल थे, जबकि 2024-25 में इनकी संख्या 10,13,322 रह गई। यानी कुल कमी 93,779 स्कूलों की रही।
हर दिन औसतन करीब 25 सरकारी स्कूल कम हुए
इन आंकड़ों को दस वर्षों की अवधि में बांटें तो सरकारी स्कूलों की संख्या में औसतन करीब 25.7 स्कूल प्रतिदिन की कमी बैठती है। यही आंकड़ा राजनीतिक भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट में “हर दिन 25 सरकारी स्कूल बंद” के रूप में सामने आ रहा है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है। नीति आयोग की रिपोर्ट स्कूलों की संख्या में कमी को केवल सरकारी आदेश से स्कूल बंद किए जाने के रूप में नहीं बताती। रिपोर्ट में कम नामांकन वाले स्कूलों को दूसरे स्कूलों के साथ मिलाने, बदलती जनसांख्यिकी और स्कूल जाने वाली उम्र की आबादी में बदलाव जैसे कारणों को भी विश्लेषण का हिस्सा बनाया गया है। रिपोर्ट आगे चलकर स्कूलों के युक्तिसंगतीकरण और Composite School व्यवस्था को नीति सुधार के रूप में भी देखती है।
इसलिए “94 हजार स्कूलों को मरम्मत के बजाय बंद कर दिया गया” वाला दावा एक राजनीतिक आरोप के रूप में तो रखा जा सकता है, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से यह निष्कर्ष सीधे साबित नहीं होता कि इन सभी स्कूलों को केवल इसलिए बंद किया गया क्योंकि सरकार ने उनकी मरम्मत नहीं कराई।
सरकारी स्कूल घटे, निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी
इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार 2014-15 में देश में करीब 2.88 लाख निजी स्कूल थे, जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 3.39 लाख हो गए। इसी अवधि में सरकारी स्कूलों की संख्या में 93,779 की कमी आई।
छात्रों की संख्या में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है। 2014-15 में देश के स्कूलों में कुल नामांकन करीब 26.95 करोड़ था, जो 2024-25 में घटकर लगभग 24.69 करोड़ रह गया। यानी कुल स्कूली नामांकन में करीब 2.26 करोड़ की कमी दर्ज हुई। नीति आयोग ने इसके पीछे घटती जन्मदर, स्कूल जाने वाली आयु की आबादी में बदलाव, स्कूलों के विलय और बच्चों को ऊंची कक्षाओं तक शिक्षा से जोड़े रखने की चुनौतियों जैसे कारकों का उल्लेख किया है।
असल सवाल केवल स्कूलों की संख्या नहीं, स्कूल तक पहुंच और गुणवत्ता का है
सरकारी स्कूल का भवन बंद होना या किसी दूसरे स्कूल में विलय होना अपने आप में शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह है कि जिस स्कूल का विलय हुआ, वहां पढ़ने वाले बच्चों को नया स्कूल कितनी दूरी पर मिला, शिक्षक उपलब्ध हुए या नहीं, परिवहन की व्यवस्था हुई या नहीं और क्या नई व्यवस्था में पढ़ाई की गुणवत्ता बेहतर हुई।
यही वजह है कि नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाने पर जोर नहीं दिया बल्कि Composite Schools, स्कूलों के युक्तिसंगतीकरण, बुनियादी ढांचे के उन्नयन, शिक्षक उपलब्धता और स्कूल प्रबंधन को मजबूत करने की सिफारिशें की हैं। रिपोर्ट में खराब या अपर्याप्त बुनियादी ढांचे वाले स्कूलों के लिए न्यूनतम मानकों को पूरा करने और स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर की नियमित निगरानी की जरूरत भी बताई गई है।
नोटबंदी और BJP कार्यालयों का मुद्दा भी पुराना है
अभिजीत दीपके के बयान में सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी को भाजपा के जिला कार्यालयों के विस्तार से जोड़कर राजनीतिक सवाल उठाया गया है। यह बात भी रिकॉर्ड में है कि भाजपा ने 2016 के आसपास देशभर में जिला स्तर के स्थायी कार्यालय विकसित करने की योजना पर काम तेज किया था।
नोटबंदी 8 नवंबर 2016 को घोषित हुई थी। इसके आसपास भाजपा द्वारा विभिन्न राज्यों में पार्टी कार्यालयों के लिए जमीन खरीदने की खबरें भी सामने आई थीं। उदाहरण के लिए नवंबर 2016 की एक रिपोर्ट में ओडिशा के कई जिलों में भाजपा द्वारा कार्यालयों के लिए जमीन खरीदने की जानकारी दी गई थी। भाजपा के तत्कालीन राज्य नेतृत्व ने उस समय कहा था कि कार्यालय बनाने की योजना नोटबंदी से पहले की थी और इसका नोटबंदी से संबंध नहीं था।
राजस्थान के कोटा में भी नवंबर 2016 से पहले भाजपा द्वारा पार्टी कार्यालय के लिए जमीन खरीदने की खबर सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 3,000 वर्ग मीटर जमीन के लिए लगभग दो करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ था।
बाद के वर्षों में भाजपा ने देशभर में जिला कार्यालयों के निर्माण का व्यापक अभियान चलाया। 2022 में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा 512 से अधिक कार्यालयों के निर्माण अथवा योजना से संबंधित आंकड़ों का उल्लेख किया गया था और पार्टी ने देशभर के संगठनात्मक जिलों में कार्यालय विकसित करने का लक्ष्य रखा था।
इसलिए यह कहना उचित है कि भाजपा ने पिछले दशक में अपना संगठनात्मक बुनियादी ढांचा बड़े पैमाने पर बढ़ाया। लेकिन यह साबित करने के लिए अलग और प्रमाणित वित्तीय आंकड़ों की जरूरत होगी कि इन कार्यालयों पर खर्च होने वाली राशि सीधे उन सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए उपलब्ध धन के स्थान पर खर्च की गई थी। दोनों मदों का पैसा एक ही सरकारी बजट खाते से आता है, ऐसा उपलब्ध दस्तावेजों से साबित नहीं होता।
BJP कार्यालय बनाम सरकारी स्कूल- राजनीतिक सवाल बड़ा, लेकिन तुलना में सावधानी जरूरी
यहीं अभिजीत दीपके के बयान का राजनीतिक महत्व सामने आता है। उनका सवाल मूलतः सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर है। अगर देश में लाखों बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और हजारों स्कूलों की स्थिति कमजोर है, तो क्या सरकार को सरकारी स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं पर और अधिक निवेश नहीं करना चाहिए?
यह सवाल पूरी तरह सार्वजनिक बहस का विषय है
लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के जिला कार्यालय राजनीतिक दल की अपनी संगठनात्मक संपत्ति और गतिविधियों से संबंधित हैं। उनके निर्माण की वित्तीय व्यवस्था और सरकारी स्कूलों की मरम्मत के बजट अलग विषय हैं। इसलिए दोनों को सीधे एक-दूसरे का विकल्प बताने के लिए ठोस वित्तीय प्रमाण आवश्यक होंगे।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बड़ी तस्वीर
नीति आयोग के अनुसार 2024-25 में देश में कुल 14.71 लाख स्कूल थे। इनमें 10,13,322 सरकारी स्कूल, 79,349 सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल और लगभग 3.40 लाख निजी स्कूल शामिल थे। सरकारी स्कूलों में करीब आधे से अधिक छात्र पढ़ते हैं, जबकि निजी स्कूलों में भी बड़ी संख्या में बच्चे नामांकित हैं।
रिपोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था में कई सकारात्मक बदलावों के साथ गंभीर चुनौतियों की भी पहचान की है। खास तौर पर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट चिंता का विषय बना हुआ है। मध्य प्रदेश में 2024-25 के दौरान माध्यमिक स्तर का ड्रॉपआउट रेट 16.8 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो राष्ट्रीय स्तर पर कई राज्यों की तुलना में ऊंचा है।
इसका अर्थ यह है कि बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रह सकती कि कितने स्कूल बंद हुए या कितने नए स्कूल खुले। असली चुनौती यह है कि बच्चे स्कूल में टिकें, उन्हें पर्याप्त शिक्षक मिलें, भवन सुरक्षित हों, शौचालय और बिजली जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों और कक्षा में सीखने का स्तर बेहतर हो।
राजनीतिक बयान से आगे बढ़कर जरूरी है सार्वजनिक हिसाब
अभिजीत दीपके का बयान एक राजनीतिक आरोप है, लेकिन इसके पीछे उठाया गया शिक्षा का सवाल गंभीर है। देश में 93,779 सरकारी स्कूलों की संख्या कम होना निश्चित रूप से ऐसा आंकड़ा है जिस पर संसद, राज्य विधानसभाओं और शिक्षा नीति के स्तर पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।
सरकारों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इनमें कितने स्कूल वास्तव में बंद हुए, कितने दूसरे स्कूलों में विलय किए गए, कितने स्कूलों में नामांकन शून्य या बेहद कम था, कितने भवन जर्जर थे और कितने स्कूलों के बच्चों को विलय के बाद दूसरे विद्यालयों में स्थानांतरित किया गया।
इसके साथ ही प्रत्येक जिले के स्तर पर यह सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि स्कूलों के विलय के बाद बच्चों की औसत यात्रा दूरी कितनी बढ़ी, कितने शिक्षकों का पुनर्विन्यास हुआ और क्या नए स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त हैं।
“94 हजार स्कूल बंद” का आंकड़ा हवा में किया गया दावा नहीं है। नीति आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर 10,13,322 हुई, यानी 93,779 की कमी आई। लेकिन आधिकारिक रिपोर्ट इस पूरी कमी को केवल “स्कूल बंद करने” का परिणाम नहीं बताती; इसमें विलय, कम नामांकन और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे कारण भी शामिल हैं।
दूसरी ओर भाजपा ने पिछले दशक में अपने जिला स्तर के संगठनात्मक ढांचे और कार्यालयों का विस्तार जरूर किया है। मगर यह दावा कि नोटबंदी के बाद पार्टी कार्यालय बनाने के लिए सरकारी स्कूलों की मरम्मत का पैसा रोक दिया गया या स्कूलों को इसी कारण बंद किया गया, उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं है।
इसलिए अभिजीत दीपके के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक तुलना से ज्यादा वह सवाल है जो इसके पीछे छिपा है—क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था में सरकारी स्कूलों को बंद या विलय करने के बजाय उन्हें बेहतर बनाने पर पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है?
यह सवाल सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उन करोड़ों परिवारों का है जिनके बच्चों की शिक्षा आज भी सरकारी स्कूलों पर निर्भर है।

